Friday, 28 February 2014

खबरों की परिभाषा बदली

स्वप्निल सिंह, शोधार्थी, सामााजिक पद्धति अध्ययन संस्थान, जेएनयू: पिछले दो दशकों में भारतीय पत्रकारिता, खास कर भाषाई पत्रकारिता ने जिस तरह से भारतीय समाज को प्रभावित किया है उस रूप में इसे अध्ययन का विषय नहीं बनाया गया. इस लिहाज से हिंदी पत्रकारिता को लेकर हाल ही में अंतिका प्रकाशन से छपी इस शोध आधारित पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए.  

इस पुस्तक में लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता में आए बदलाव और उस पर पड़े प्रभावों का आकलन किया है.  भूमंडलीकरण की विस्तृत व्याख्या के बाद किताब में नवभारत टाइम्स, दिल्ली के अखबार को आधार बना कर सामग्री विश्लेषण की पद्धति से विषय विस्तुओं की पड़ताल की गई है.  भूमंडलीकरण के दौर में पूंजीवाद एक जीवन मूल्य के रूप में स्थापित हो गया है. इसके केंद्र में मुनाफा है. अब खबर एक सूचना ना होकर खुद उत्पाद है, जिसे उपभोक्ता को बेचा जा रहा है. सुर्खियों में अब राजनीति या अंतरराष्ट्रीय समाचार के बदले खेल और कारोबार को ज्यादा स्पेस दिया जा रहा है. स्त्रियों के प्रति हिंसा को भी इस भाषा में प्रस्तुत किया जाता है कि सनसनी पैदा हो. लेखक ने एक जगह नोट किया है- अखबारों के स्त्री विमर्श में जहाँ स्त्रियों के शोषण उत्पीड़न का जिक्र मिलता है वहीं स्त्री के संघर्ष के बारे में एक तरह की चुप्पी है. साथ ही किताब में उदाहरणों के जरिए यह बखूबी दिखाया गया है कि किस तरह स्त्रियों से संबंधित खबरों को पुरुषवादी नजरिए से पाठकों को प्रस्तुत किया जा रहा है. इसकी एक वजह पत्रकारिता की संरचना में स्त्रियों की कम उपस्थिति भी है.

पुस्तक दिखाती है कि किस तरह से भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी आम जनों से कटती जा रही है और बाजार के सुर में सुर मिला कर हिंग्रेजी को अपना रही है. एक तरफ बाजार ने जहाँ हिंदी अखबारों को गाँव-कस्बों तक पहुँचा दिया है वहीं खुद भी वह बाजार के चपेट में आई है.

हिंदी पत्रकारिता के पेज, ले आउट और डिजाइन के क्षेत्र जहां भूमंडलीय तकनीक के बदौलत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं, वहीं विषय वस्तु को लेकर ये बात नहीं कही जा सकती है. हिंदी के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में भी बौद्धिक बहस-मुबाहिसा का स्थान सिकुड़ता चला रहा है. पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में हिंदी पत्रकारिता ने हाशिए के समाज को एक आवाज दी है. जिसे लेखक ने किताब में रेखांकित भी किया है. पर लेखक की चिंता भूमंडलीकरण के दौर में धर्म के बाजारीकरण की भी है. किताब के माध्यम से यह बात सामने आती है कि अखबारों के लिए आस्था का नकदीकरण जैसे एक मजबूरी बन गई है. लेखक ने अखबार को उद्दृत करते हुए लिखा है-हम सब उत्सव प्रेमी हैं. उत्सवधर्मी है हमारा देश. यहाँ हर दिन एक त्योहार है और हर पत्थर एक देवता. पढ़िए इस जीवन, समाज और इसकी आस्था के बारे में हर सोमवार हमारे उत्सव पृष्ठ पर.

पुस्तक में इस अवधारणा की पड़ताल की गई है कि पिछले दो दशकों से किसान, मजदूर, दलित और आदिवासी को लेकर अखबारों का क्या रूख रखा है.  ना तो पहले ये अखबारों के लिए खबर थे ना ही आज. पिछले कुछ सालों में हिंदी अखबारों में दलितों के लेकर जो विमर्श सामने आ रहे हैं जो एक तरह से सर्व व्यापी बाजार के पक्ष में ही है. अपने पत्रकारिता के अनुभव का इस्तेमाल कर लेखक ने किताब में विस्तृत ढंग से इसका विश्लेषण किया गया है. 

हिंदी भले ही सत्ता की भाषा बनके उभरी हो, पर हिंदी पत्रकारिता की पहुँच सत्ता तक उस रूप में नहीं है जिस रूप में अंग्रेजी की है. आने वाले समय में हिंदी अखबार समाज में किस रूप में अपनी पहचान कायम रख पाते हैं यह उसकी विचारधारा और बाजार के संबंध से ही परिभाषित होगा.  पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के साथ-साथ भारतीय राज्य और समाज के साथ मीडिया के संबंधों को लेकर जिज्ञासुओं के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है.

(भारतीय समाजशास्त्र समीक्षा (शोध पत्रिका), जनवरी-मार्च 2014 में प्रकाशित, पेज 144-145)

Saturday, 8 February 2014

संकुचन का समाचार

  प्रांजल धर,  जनसत्ता, 9 फरवरी 2014:  अरविंद दास की पुस्तक हिंदी में समाचार पत्रकारिता के तमाम विचलनों, दबावों और बदलावों का वर्णन-विश्लेषण करती है। इसमें इस बात का नोटिस लिया गया है कि समाज की जिन संस्थाओं पर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है, उनमें से पत्रकारिता भी एक है। जो काम पहले मिशन था, वह बाद में व्यवसाय बना और आज उसकी दशा-दिशा क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। पुस्तक में सामग्री विश्लेषण पर तीन अध्याय हैं जो स्त्री, धर्म, अर्थतंत्र, साहित्य, खेल, किसान, मजदूर और दलित-आदिवासियों के संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों और दशकों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं।

भूमंडलीकरण की वर्तमान अवस्था में उभरे पितृसत्ता के नए रूपों की छवि भी हिंदी अखबारों में दिखाई पड़ती है। हमारी पत्रकारिता में महिलाओं की दशा क्या है, इसका अंदाजा इस पुस्तक से मिलता है। भारत में स्त्री-संघर्ष का इतिहास देश की राजनीतिक, सामाजिक, मजदूर और दलित आंदोलन से संबद्ध रहा और उससे समय-समय पर प्राणवायु हासिल करता रहा है। ऐसे में इस बात की जांच गहराई से किए जाने की दरकार है कि भूमंडलीकरण के बाद अखबारों में किस स्त्री की छवि को परोसा जा रहा है? और क्या स्त्रियों को उतनी आजादी हासिल है, जितनी पुरुषों को, इस सवाल से पत्रकारिता को जूझने की जरूरत है।
पहले जहां अखबार स्त्रियों के संदर्भ में स्वतंत्रता पर, कुटीर उद्योग या फिर महिलाओं की असल समस्याओं पर लिखते थे, वहीं आज सिखाया जाता है किदुल्हन वही जो प्रतियोगिता जीत जाए अपनी पुस्तकहिंदी में समाचारमें अरविंद ऐसी तमाम बुनियादी बातों की तह तक जाते हैं और पिछले काफी समय से चल रहे स्त्री-हिंसा, यौन शोषण या दलित-शोषण का सार्थक जायजा लेते हैं।
पत्रकारिता में प्रबंधकों और संपादकों के आपसी संबंधों के साथ-साथ मालिकों को लेकर भी यह पुस्तक थोड़ा-बहुत विमर्श करती है। समाचार माध्यमों में स्वामित्व की बात करें तो कुछ गंभीर चिंताएं सामने आती हैं। भारतीय समाचार उद्योग के विस्तार और विकास के बावजूद खिलाड़ियों की संख्या सिर्फ घटी, बल्कि एक ओर मीडिया परिदृश्य निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है और दूसरी ओर पब्लिक स्फीयर का क्षेत्रफल भी घट रहा है। इसका असर वैचारिक बहुलता और पाठकों तक पहुंचने वाली खबरों की विविधता पर सीधा पड़ रहा है।
यह छिपी बात नहीं है कि बड़ी पूंजी के जरिए अनेक ऐसे लोग अखबारों और टीवी चैनलों समेत विभिन्न समाचार माध्यमों के मालिक और नियंता बने बैठे हैं, जिन्हें पत्रकारिता के पेशे और उसकी नैतिकता से ज्यादा चिंता इस बात की है कि अपने आप को सुरक्षित कैसे किया जाए। आज ऐसी आशंका जताई जा रही है कि बड़ी पूंजियों के दबाव में छोटे और मंझोले खिलाड़ियों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल होता जाएगा। इसमें किसी आश्चर्य की बात इसलिए नहीं है, क्योंकि पूंजी का चरित्र ही ऐसा होता है, जहां बड़ी पूंजी छोटी पूंजी को निगल जाती है। समाचार माध्यमों के स्वामित्व के संदर्भ में आज भारतीय ही नहीं, पश्चिमी समाचारपत्र जगत में भी ऐसी बहसें बेहद आम हो चली हैं कि क्या अखबारों के स्वामित्व में संकेंद्रण बढ़ रहा है? यह संकेंद्रण विचारों का उपवन कहे जाने वाले पब्लिक स्फीयर और पत्रकारीय प्रतिबद्धता के लिहाज से अच्छा या सराहनीय बिल्कुल नहीं है।
समाचारों के संदर्भ मेंएक्टिव रिपोर्टरनामक अपनी चर्चित किताब में लेविस जेम्स ने जिस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं को अखबारों की आत्मा माना है, उस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं की कमी भी अखरने वाली बात है। असल में यह पेज-थ्री पत्रकारिता का दुष्प्रभाव ही है। वर्तमान समय में उन्हीं हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या ज्यादा है, जो अंग्रेजी में निकलने वाले प्रतिष्ठित अखबारों के सहायक अखबारों के रूप में निकल रहे हैं। इसे हिंदी अखबारों के दुर्भाग्य और अवांछित विकास के तौर पर लिया जाता है। कहा जाता है कि हिंदी अखबार, अंग्रेजी अखबारों के सांचे में ढल कर उनका प्रतिरूप, या प्रकारांतर से पिछलग्गू, बनते जा रहे हैं। ऐसे अनेक कोणों पर अरविंद विचार करते हैं, पर यह विचार-विश्लेषण और भी ज्यादा गहरा हो सकता था।
हालांकि यह पुस्तक अंग्रेजी मीडिया के साथ-साथ प्रसंगवश बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान का भी विश्लेषण करती चलती है, पर सवाल है कि क्या हिंदी की जनता अंग्रेजी कीपब्लिकवाले जीवन मूल्यों और समाचार-मूल्यों को बिना किसी हिचक के स्वीकार कर पाने की स्थिति में चुकी है? यहां आकर पत्रकारीय सरोकारों के सिकुड़ते चले जाने का सवालभारतऔरइंडियाके बीच पसरे विशाल अंतरों से जुड़ जाता है। स्वामित्व के इस संकेंद्रण का ही दुष्प्रभाव है कि इस समयआजजैसा महत्त्वपूर्ण हिंदी अखबार भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
हिंदी भाषा के संदर्भ में उत्तर प्रदेश को भले भारत का हृदयस्थल यानी हार्टलैंड कहा जाता रहा हो, लेकिन यहां भीएनआइपी’, ‘अमृत प्रभात’, ‘आज’, ‘स्वतंत्र भारत’, ‘स्वतंत्र चेतना’, ‘जनवार्ताऔरजनमोर्चाजैसे कई अखबार या तो बंद हो गए या फिर हाशिये पर चले गए हैं। कुछ तो किसी तरह चल रहे हैं, लेकिन उनकी आयु ज्यादा लंबी नहीं है। और फिर बात केवल बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे एक-दो राज्यों की ही नहीं है। राजस्थान की बात करें तो वहां भीनवज्योतिका ग्राफ नीचे जा रहा है और यही हाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मेंनवभारतऔरदेशबंधुका है।
आज के मीडिया विश्लेषण स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी किसी एक या दो बड़े मीडिया समूहों का स्पष्ट प्रभुत्व भले दिखता हो, लेकिन विभिन्न भाषाई क्षेत्रों या राज्यों में एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां साफ देखी जा सकती हैं। भारत में कम से कम छह ऐसे राज्य हैं, जहां एक बड़ी मीडिया कंपनी का बढ़ता दबदबा स्पष्ट रूप से नजर आता है। इन सब मुद्दों पर और भी गंभीर रोशनी डाली जा सकती थी। परिशिष्ट में यह विज्ञापनों पर विमर्श के साथ-साथ प्रभाष जोशी का साक्षात्कार और अनेक वरिष्ठ लोगों से बातचीत भी प्रस्तुत करती है। इसे लिखने के क्रम में लेखक ने खासा क्षेत्रीय कार्य किया है।
हिंदी में समाचार: अरविंद दास; अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-2, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद, उप्र; 390 रुपए।