Showing posts with label media. Show all posts
Showing posts with label media. Show all posts

Wednesday, 26 October 2016

हिंदी में एकांगी मीडिया मंथन


अरविंद दास ने जेएनयू से मीडिया पर पीएचडी कर रखी है। मेरे जानते हिन्दी में मीडिया पर जो गिनी चुनी शोधपूर्ण पुस्तकें हैं उनमें एक अरविंद दास की किताब भी है- हिंदी में समाचार। एक मीडिया संस्थान में काम भी करते हैं। बहरहाल, मीडिया और विज्ञापन को लेकर उनकी यह टिप्पणी गौरतलब लगी। मौका मिले तो पढ़िएगा, सोचिएगा- मॉडरेटर (जानकी पुल)  
================================
राज्यसभा टीवी पर मीडिया मंथन’ नाम से एक रोचक कार्यक्रम आता हैजिसके एंकर हैं हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश. शनिवार (22 Oct) को प्रसारित हुए इस कार्यक्रम का विषय था मीडिया में विज्ञापन या विज्ञापन में मीडिया’. विषय काफी मौजू और समकालीन पत्रकारिता की चिंता के केंद्र में है.

पर कार्यक्रम देख कर काफ़ी निराशा हुई. उम्मीद थी कि मंथन से कुछ निकलेगालेकिन निकला वही ढाक के तीन पात! हिंदी में जो इन दिनों मीडिया विमर्श है वह मंडीदलाल स्ट्रीटदुष्चक्र जैसे जुमलों के इधर-उधर ही घूमता रहता है. इसी तरह उर्मिलेश और जो कार्यक्रम में मौजूद गेस्ट थे इसी विमर्श के इर्द-गिर्द अपने विचारों को परोसते रहेजो कि अंग्रेजी विमर्श में कब का बासी हो चला है. उर्मिलेश भी अंत में इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि ‘ बाज़ार के दुष्चक्र से मीडिया की मुक्ति नहीं’. ‘वह अभिशप्त है’. वगैरहवगैरह.

विमर्श की चिंता के केंद्र में यह था कि विज्ञापन और ख़बर के बीच अब कोई फर्क नहीं बचा है’. ‘पत्रकारिता के सामाजिक सरोकर बिलकुल ख़त्म हो गए हैं.’ पेड न्यूजएडवरटोरियल इन दिनों ख़बरों पर हावी हैआदि.

सवाल बिलकुल जायज है और यह स्थापित तथ्य है कि पेड न्यूज़एडवरटोरियल मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न बन कर खड़े हैं. और इस पर कई वरिष्ठ पत्रकारशोधार्थी पिछले दशक से लिखते रहे हैंबहस-मुबाहिसा करते रहे हैं.
 
पर कार्यक्रम के दौरान इन सारे सवालोंबहस के बीच कोई आंकड़ा नहीं था (पहले कितना रेशियो विज्ञापन और खबर का था जब आठ-दस पेज का अखबार होता थाऔर आज 20-25 पेज के अखबार में क्या रेशियो है). कोई स्रोत नहीं थे. 

1953 में ही संपादक अंबिका प्रसाद वाजपेयी विज्ञापन को समाचार पत्र की जान कह रहे थे. और हिंदी समाचार पत्रों के विज्ञापन के अभाव में निस्तेज होने का रोना रो रहे थे. 1954 में पहले प्रेस कमीशन ने अखबारों में बड़ी पूंजी के प्रवेश की बात स्वीकारी थी. पर इसका लाभ अंग्रेजी के अखबारों को मिलता रहा. 

उदारीकरणनिजीकरणभूमंडलीकरण के बाद ही भारतीय भाषाई अखबार विज्ञापन उद्योग से जुड़ कर लोगों तक ठीक से पहुंच सके. रौबिन जैफ्री ने अपने लेखों में विस्तार से इसे रेखांकित किया हैसेवंती निनान इसे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कार (reinvention of public sphere) कहती हैं. जाहिर है इस पुनर्विष्कार में विज्ञापनपूंजीवादी उद्योग के उपक्रम तकनीक की प्रमुख भूमिका थी. मैंने भी अपनी किताब हिंदी में समाचार’ में विस्तार से रेखांकित किया है कि किस तरह भूमंडलीकरण के बाद हिंदी के अखबार जो अंग्रेजी के पिछलग्गू थेएक निजी पहचान लेकर सामने आए हैं.

पर अपनी बहस में उर्मिलेश ना तो इस भाषाई मीडिया क्रांति’ की चर्चा करते हैना ही अखबारोंचैनलों के प्रचार-प्रसार से आए लोकतंत्र के इस स्थानीयदेसी रूप को देखते-परखते हैं. 

साथ ही विज्ञापन की इस बहुतायात मात्रा से परेशानी किसे हैपाठकों-दर्शकों को कि मीडिया के विमर्शकारों कोक्या कोई सर्वे है कि असल में पाठक-दर्शक विज्ञापन चाहते हैं या नहीं. यदि हांतो कितना विज्ञापन उपभोक्ता चाहते हैंहम एक कंज्यूमर सोसाइटी (उपभोक्ता समाज) में रह रहे हैंऐसे में विज्ञापन की भूमिका को एक नए सिरे से देखने की जरूरत हैमहज 'शोरकह कर हम इसे खारिज़ नहीं कर सकते. 

जब पच्चीस रुपए का अख़बार पाँच रुपए में मिल रहा होज्यादातार मीडिया हाउस का कारोबार घाटे में होऐसे में विज्ञापन पर निर्भरता स्वाभाविक है. पर हिंदी में मीडिया मंथन इसे एक इच्छाशक्ति से बदलने’, ‘organic approach (?)’ को बढ़ावा देने से आगे किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा. यह विमर्श मीडिया को पूंजीवाद की महत्वपूर्ण इकाई मानने से ही परहेज करता प्रतीत होता है. इसके विश्लेषण के औजार पत्रकारिता के वही गाँधीवादीशुद्धतावादी कैनन है (गाँधी विज्ञापन के प्रति काफी सशंकित थे. वे अपने पत्रों में विज्ञापन के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते थे99 प्रतिशत विज्ञापन को पूरी तरह से बकवास मानते थे ) जो आज़ादी के साथ ही भोथरे हो गए थे.
 (जानकी पुल वेब साइट पर प्रकाशित, 26 अक्टूबर 2016) 

Saturday, 6 April 2013

हिंदी में समाचार


अंतिका प्रकाशन, सजिल्द, मूल्य: 390 रुपए
ISBN Number: 9789381923573 

किताब के बारे में  
भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं हिंदी अखबार जो अंग्रेजी अखबारों के पिछलग्गू बने हुए थे, अपनी निजी पहचान लेकर सामने आए संचार क्रांति के दौर में इनके व्यावसायिक हितों के फलने-फूलने का खूब मौका मिला और आज येग्लोकल’  हैं
उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज के स्वरूप में आए परिवर्तनों के बरक्स भारतीय मीडिया ने भी खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण, प्रबंधन आदि में परिवर्तन किया हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखेगा कि खबरों के मानी, उसके उत्पादन के ढंग बदल गए हैं अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं भाषा, स्त्री और दलित विमर्श का एक नया रूप उभरा है मिश्रित-अर्थव्यवस्था में जो मध्यवर्गीय इच्छा दबी हुई थी,  वह खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है खबरों के कारोबार मेंपेड न्यूजफाँस नजर आने लगी है हिंदी पत्रकारिता की इन स्थितियों को यह शोधपरक किताब पहली बार सामग्री विश्लेषण और उदाहरणों के जरिये  निरूपित करती है
वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते आए समकालीन भूमंडलीकरण ने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए?  शोध और पत्रकारिता के अपने साझे अनुभव का इस्तेमाल कर अत्यधिक परिश्रम से लेखक ने इसका विवेचन और विश्लेषण किया है
हिंदी में समाचारके मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है

लेखक परिचय:अरविंद दास
जन्म: 1978 में बेलारही, मधुबनी (बिहार) में
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई, आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से हिंदी साहित्य और मीडिया में शोध  भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज  से उर्दू में डिप्लोमा जर्मनी के जिगन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरल शोध पीएचडी के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पोस्ट डॉक्टरल शोध के लिए जर्मन रिसर्च फांउडेशन फेलोशिप
देश-विदेश में मीडिया को लेकर हुए सेमिनारों, वर्कशॉपों में शोध पत्रों की प्रस्तुति भारतीय मीडिया के विभिन्न आयामों को लेकर जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान  इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों के लिए 2012 में 'न्यू मीडिया' को लेकर ट्रेनिंग और कोलंबो में हुए  वर्कशॉप में भागीदारी
पत्रकारिता का ककहरा जनसत्ता से सीखा बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहेअलग अंदाजके ब्लॉगर ब्लॉग लेखों का संकलन-'गुल,नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी' शीघ्र प्रकाश्य मिथिला कला को लेकर एक लघु पुस्तिका- गर्दिश में एक चित्र शैली प्रकाशित
फिलहाल पिछले दो वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी आईटीवी के सीनियर रिसर्चर विशेष तौर पर सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित होने वाले चर्चित कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट' और 'लास्ट वर्ड' के शोध की जिम्मेदारी

 विषयक्रम

                             प्रस्तावना                                                                                               

अध्याय 1
       भूमंडलीकरण की अवधारणा
         भूमंडलीकरण का परिप्रेक्ष्य
        भूमंडलीकरण और पत्रकारिता
अध्याय 2
       अखबार का बदलता स्वरूप: पहला पन्ना
         रूप-रेखा
        सुर्खियाँ एवं उनके विषय 
                                                     भाषाशैली
        विज्ञापन
अध्याय 3
        सामग्री विश्लेषण I
         स्त्री
        धर्म
        अर्थतंत्र
अध्याय 4
        सामग्री विश्लेषण II
         साहित्य
        खेल
अध्याय 5
         सामग्री विश्लेषण III
         किसान एवं मजदूर
         दलित एवं आदिवासी
अध्याय  6
         प्रबंधन एवं संचालन
         प्रबंधन का ढाँचा
        मालिक और संपादक: भूमिका एवं संबंध
        पत्रकारों का चयन एवं नियुक्तियाँ
निष्कर्ष

परिशिष्ट


 (गीता बुक सेंटर और जवाहर बुक सेंटर, जेएनयू में उपलब्ध)

   (अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9868 380797, 98718 56053, अरविंद दास, मोबाइल: 09990 306477)