समीक्षा: अमर उजाला, कल्लोल चक्रवर्ती भूमंडलीकरण ने हिंदी अखबारों को कितना बदला है? युवा
पत्रकार अरविंद दास बहुत मेहनत से तैयार अपने शोध पत्र में सिलसिलेवार ढंग
से बताते हैं कि पहले पन्ने पर राजनीतिक खबरों का वर्चस्व कम हुआ है। पहले
सभी अखबारों में सुर्खियां एक-सी रहती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
पहले स्थानीय खबरों को छापना गंभीर पत्रकारिता के खिलाफ
माना जाता था। अब अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुकाबले स्थानीय खबरों को ज्यादा
तरजीह दी जाने लगी है। खबरों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है।
लेकिन भाषा पहले की तुलना में बेहतर भी हुई है। अब छोटे-छोटे वाक्य लिखे
जाते हैं और खबरों की भाषा अनौपचारिक है। औरतों पर होने वाले अत्याचार की
भाषा में चिंता या आक्रोश के बजाय एक किस्म की रसलीनता दिखती है। धार्मिक
समारोह, पर्व-त्योहार आदि के प्रति अखबारों में जगह बढ़ी है। आर्थिक खबरों
का महत्व बहुत अधिक बढ़ा है। हिंदी क्षेत्र में शिक्षा और समृद्धि बढ़ी है,
लेकिन साहित्य के पाठक कम हुए हैं।
इसी तरह हाशिये के लोगों की मौजूदगी भी कम से कम है। पहले जो विज्ञापन अखबारों के बीच के पृष्ठों पर होते थे, वे अब पहले पेज पर आ गए हैं। भूमंडलीकरण के साथ आई संचार क्रांति के औजारों का इस्तेमाल अखबार की साज-सज्जा पर बढ़ा है। अब फोटो, ग्राफिक्स और एनिमेशन आदि के मुताबिक खबरों को सजाया जाता है। लेखक के शोध का आधार ′नवभारत टाइम्स′ है, जिस पर भूमंडलीकरण का असर सबसे पहले दिखा और सबसे अधिक भी। लेकिन तथ्य यह भी है कि हिंदी के जिन अखबारों ने प्रसार के मामले में अंग्रेजी अखबारों को बेदखल किया, उनमें ′नवभारत टाइम्स′ नहीं है। इसलिए उदारीकरण और हिंदी अखबारों का कोई भी अध्ययन उन क्षेत्रीय अखबारों के विश्लेषण के बगैर पूरा नहीं होगा, जिनके कई राज्यों में संस्करण हैं। इसके बावजूद उदारीकरण और हिंदी अखबारों पर यह एक अत्यंत जरूरी किताब तो है ही।
(अमर उजाला के रविवार अंक में 15 सितंबर 2013 को प्रकाशित)

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