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Tuesday, 2 February 2021

हिन्दी अखबारों में क्या छप रहा है

समीक्षक: हुसैन ताबिश

"भूमंडलीकरण के बाद अखबारों ने खबरों की नई परिभाषा गढ़ी है जिसका मतलब है - खुशखबरी। अखबार आहत करने वाली खबरों को छापने से बचते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अखबार यथास्थिति को बरकरार रखने में राज्य और सत्ता के सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी के अखबार खबरों को शासक वर्ग के नजरिए से ही देखते और उसका विश्लेषण करते हैं।
ऐसे में अखबारों में मनोरंजन, फिल्म, क्रिकेट और सेंसेक्स की खबरें प्रमुखता पा रही हैं। वहीं किसानों की बदहाली, दलितों के उत्पीड़न और आदिवासियों की जंगल और ज़मीन से बेदखली सुर्खियां तो दूर अखबार के अंदर के पन्नों पर भी बमुश्किल ही जगह पाते हैं।

खबरें चुनिंदा वर्ग और समूहों तक सिमट गई है। अखबारों के आंतरिक ढांचे में भी इसी वर्ग के पुरुषों का वर्चस्व है।"
उपरोक्त अंश लेखक, शोधार्थी और वरिष्ठ पत्रकार अरविंद दास की पुस्तक " हिंदी में समाचार " के हैं। Antika प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है और ३९० रुपए की कीमत पर यह किताब Amazon पर उपलब्ध है।
६ अध्यायों में बंटी १९० पेज की यह किताब सीनियर रिसर्च फेलोशिप के तहत शोध और प्राथमिक आंकड़ों के आधार पर लिखी गई है।

किताब में हिंदी के अखबारों पर भूमंडलीकरण, उदारीकृत अर्थव्यवस्था और नव पूंजीवादी संस्कृति के प्रभावों का सम्यक अध्ययन किया गया है। यह राज्य सत्ता, कारपोरेट और समाचार पत्रों के अंतर्संबंधों की भी परतें खोलती है।
पुस्तक इस बात की गहन पड़ताल करती है कि आखिर कैसे अखबारों ने पाठकों की चिंता छोड़कर अपने ग्राहकों की तलाश कर ली है और यही उनके असली माई बाप बन गए हैं। पाठक की भूमिका सिर्फ एक खरीदार की है, और अखबार खबरों की आड़ में उन तक विज्ञापन पहुंचाने का एक जरिया भर है।

वर्ष १९९९ में बेनेट और कोलमैन कंपनी के उपाध्यक्ष भास्कर दास ने कहा था, " प्रिंट मीडिया के मुख्य खरीदार विज्ञापनदाता हैं जो इसका इस्तेमाल अपने खरीदारों तक पहुंचने के लिए करते हैं।"
खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण और उसके विशेष ट्रीटमेंट पर बाज़ार के दबाव और प्रबन्धन तंत्र के हस्तक्षेप का लेखक ने बारीकी से अध्ययन किया है। हिंदी के अखबारों में गांव, गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और स्त्रियों को लेकर उपेक्षा भाव की लेखक यहां शिकायत करता है।
किताब लिखती है, हिंदी अखबारों में स्त्री विमर्श में जहां स्त्रियों के शोषण, उत्पीड़न का जिक्र मिलता है, वहीं स्त्रियों के संघर्ष के बारे में, दलित स्त्रियों के दोहरे अभिशाप के बारे में एक किस्म कि चुप्पी दिखती है। जबकि महानगरीय उच्च और मध्यमवर्ग की महिलाओं और उनकी सफलता के किस्सों को अखबार बढ़ा चढ़ाकर पेश करता है।
लेखक इस बात से सहमति जताता है कि भूमंडलीकरण ने महिलाओं की देह, उसके श्रम, उसकी छवि, उसके सौन्दर्य और कमनीयता का अतीत के किसी भी काल के मुकाबले सर्वाधिक दोहन किया है। यहां पितृसत्ता मजबूत हुई है, जिसका साफ असर हिंदी अखबारों में दृष्टिगोचर होता है।

" ३० वर्षीय महिला हवस का शिकार बनी" , "बलात्कार के मामले में इस वर्ष रिकॉर्ड टूटा " बलात्कार का आंकड़ा ६०० के पार" खबरों की ऐसे हेडिंग बलात्कारी के कृत्य को उत्सव की तरह मानती प्रतीत होती है। ऐसी हेडिंग से बलात्कारी को दोषी मानने के बजाए पीड़ित महिला को दोषी मानने की बू आती है। ऐसी भाषा में मर्दवादी रवैया दिखाई देता है जो पुरुषों को ऐसी खबरों पर उद्देलित करने के बजाए, महिलाओं के उपभोग की ओर उन्मुख करती दिखती है।
किताब एक अन्य तथ्य की ओर इशारा करती है कि भारतीय राजनीति में पिछले दशक में हिंदुत्वादी ताकतों के उभार को भी हिंदी अखबारों ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया है। लगभग हर अखबार में साप्ताहिक रूप से धर्म और कर्मकांड से संबंधित ऐसी खबरें भी छपती है जो धर्म और अध्यात्म से ज़्यादा अंधविश्वास को बढ़ावा देती है।
किताब में हिंदी अखबारों की भाषाई परिवर्तन पर भी गहनता से प्रकाश डाला गया है। लेखक ने लिखा है, चूंकि भूमंडलीकरण की भाषा इंग्लिश है इसलिए इसकी गिरफ्त में आकर अखबार की भाषा भी " हिंग्रेजी " हो गई है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार में हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूंस ठूंसकर हिंदी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम चल रही है और हिंदी के अखबार हिंग्रेजी का प्रयोग कर इस मुहिम को ताकत दे रहे हैं।
यहां लेखक ने जिन मुद्दों पर बात की है, वो कोई नया विषय नहीं है। मीडिया विश्लेषक और आलोचक इन मुद्दों पर बात करते रहे हैं। इन विषयों पर ढेर सारी रिपोर्ट, आर्टिकल और कुछ किताबें भी बाज़ार में उपलब्ध है।
हालांकि बाज़ार में दिलीप मंडल, विनीत कुमार जैसे लेखकों की जी किताबें हैं उनमें मीडिया के कारपोरेट चरित्र की बात ज़्यादा की गई है। इस पुस्तक की उपयोगिता इस बात में है कि इसमें कंटेंट के स्तर पर ज़्यादा बात की गई है। जो तथ्य लिखे गए हैं वो पूरी तरह शोध आधारित है।

पुस्तक में एक कमी खलती है जो काफी सामान्य है और तमाम पुस्तकों और शोध प्रोजेक्ट में इसकी उपेक्षा दिखती है। अखबार के कंटेंट को लेकर संपादकों के अलावा मलिकान और प्रबंधकों का पक्ष नहीं लिखा गया है। इनके बिना अखबार उद्योग या उसके कंटेंट पर कोई भी विमर्श अधूरा ही रह जाता है। अखबार का जो कंटेंट analysis किया गया है अगर इसमें हिंदी के किसी दूसरे अखबार या फिर अंग्रेजी के भी एक अखबार को शामिल कर तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया जाता तो विषय को समझने में और आसानी होती। पाठक हिंदी अंग्रेज़ी या फिर हिंदी के ही दो अखबारों का भेद समझ पाता। नव भारत टाइम्स जैसे दिल्ली से छापने वाले अखबारों की ये मज़बूरी भी हो सकती है कि वो अपने पाठकों के लिहाज से अपनी खबरों में गांव, किसान, मजदूर और आदिवासियों की खबरों को प्राथमिकता नहीं देता हो। इस किताब के अध्ययन में राज्यों की राजधानी से निकलने वाले या किसी कस्बाई संस्करण के अखबार को शामिल करना इसके महत्व को और बढ़ा सकता था।
फिर भी ये किताब पत्रकारिता में रुचि रखने वाले पाठकों के साथ - साथ पत्रकारिता के छात्रों, अध्यापकों और अखबार के नीति निर्धारकों को पढ़नी चाहिए। पत्रकारिता के विषयों पर शोध करने वाले उन शोधार्थियों को ये किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए जिनका शोध content analysis or observation method पर आधारित हो।
वो इस किताब से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

Saturday, 11 January 2014

ख़बरों की ख़बर

हिंदुस्तान ( 12.01.2014), धर्मेंद्र सुशांत
http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-392181.html

युवा पत्रकार-शोधार्थी अरविंद दास की यह पुस्तक वैश्वीकरण के दौर में उभरे नव पूंजीतंत्र की छाया में विकसित और परिवर्तित हुई हिंदी पत्रकारिता का गहन विवेचन करती है। जिस परिघटना को आज सूचना-संचार क्रांति कहा जाता है, उसके दौर में हिंदी समाचार जगत ने न केवल नई पहचान कायम की, बल्कि अपने व्यावसायिक हितों को भी नए सिरे से बढ़ने-व्यापक होने की दिशा में दूर तक पहुंचाया। इस सफलता के बरअक्स हिंदी मीडिया को दूसरी तरफ ‘पेड न्यूज’ जैसे लांछन का सामना भी करना पड़ा। मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में जहां सियासी और समाजी महत्व की खबरों के बदले मनोरंजन के तत्व हावी होते चले गए, वहीं प्रमुख मीडिया के सरोकार भी स्पष्ट तौर पर बदल गए। दास की यह किताब मीडिया के बहुआयामी बदलाव को सोदाहरण सामने रखती है। पिछले दो दशक का मीडिया जगत इस विवेचना के दायरे में शामिल है।



हिंदी में समाचार, अरविंद दास, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद-5, मूल्य: 390 रु.

Saturday, 2 November 2013

बाजार की पत्रकारिता

समीक्षा, प्रभात खबर: पंकज चौधरी  देश में जब से ग्‍लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ है तब से अन्‍य क्षेत्रों की तरह हिंदी पत्रकारिता में भी काफी बदलाव आए हैं. ये बदलाव खबरों के चयन में भी देखने को मिल रहे हैं. आज वही खबरें सुर्खियां बनती हैं या अखबार के पहले पेज पर जगह पाती हैं जो बाजारोन्‍मुख होती हैं. राजनीति और किसान-मजदूर की खबरों की जगह पर आज यदि आर्थिकी, सिनेमा और खेल-कूद की खबरें सुर्खियां बनती हैं तो उसके पीछे बाजार की शक्ति का हाथ है. जाहिर-सी बात है कि दलित विषय-वस्‍तु से भी संबंधित उन्‍हीं खबरों या विचार को मुख्‍यधारा की मीडिया तवज्‍जो देता है जिनके बाजार मूल्‍य तय होते हैं. अरविंद दास की किताब ‘हिन्‍दी में समाचार’ इन्‍हीं मसाइलों की प्रमुखता से पड़ताल करती है. 

यदि हम मुख्‍यधारा के मीडिया पर गौर करें, तो पाते हैं कि 25 प्रतिशत से भी अधिक की दलित आदिवासी आबादी वाले इस मुल्‍क में मुश्किल से उनकी पांच खबरें भी पूरे साल में सुर्खियां नहीं बन पाती हैं. मसला वही कि बाजार के दृष्टिकोण से इन खबरों का खास महत्व नहीं होता. लेकिन वहीं पर यदि कोई दलित बुद्धिजीवी-चिंतक दलितों के सशक्तिकरण के लिए बाजार और पूंजी की जरूरत पर बल देते हुए देखे या सुने जाते हैं तो उसे कॉरपोरेट घरानों के अखबार हाथों हाथ लेते हैं. यहां यह भी पता चलता है कि मुख्‍यधारा का मीडिया कुछ खास दलित चिंतक को ही अपना ब्रांड क्‍यों बनाता है.

यह किताब उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज में आए बदलावों के बरक्स पूरे मीडिया की बनावट, उसके चरित्र में आए परिवर्तनों की पड़ताल करती है. यह इस तथ्य को रेखांकित करती है कि हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं मिश्रित अर्थव्यवस्था में दबी मध्यवर्गीय इच्छा खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है.

मीडिया का पूरा ध्‍यान आज विज्ञापन उगाहने पर केंद्रित हो गया है. अरविंद विश्‍लेषण करते दिखते हैं कि पिछले 25 वर्षों के दरमियान हिंदी पत्रकारिता इस कदर बाजारोन्‍मुख हो गई है. वह पत्रकारिता के बदले स्‍वरूप का समग्रता से लेखा-जोखा प्रस्‍तुत करते हैं. यह किताब जनसंचार की भाषा शैली, मालिक और संपादक संबंध, पेड न्‍यूज जैसे महत्वपूर्ण समकालीन मुद्दों पर भी रोशनी डालती है. 

(प्रभात खबर, पटना के रविवार अंक में 27 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित)

Sunday, 15 September 2013

समाज का नया चेहरा, नए तेवर और पत्रकारिता

समीक्षा: अमर उजाला, कल्लोल चक्रवर्ती भूमंडलीकरण ने हिंदी अखबारों को कितना बदला है? युवा पत्रकार अरविंद दास बहुत मेहनत से तैयार अपने शोध पत्र में सिलसिलेवार ढंग से बताते हैं कि पहले पन्ने पर राजनीतिक खबरों का वर्चस्व कम हुआ है। पहले सभी अखबारों में सुर्खियां एक-सी रहती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं है। 
 
पहले स्थानीय खबरों को छापना गंभीर पत्रकारिता के खिलाफ माना जाता था। अब अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुकाबले स्थानीय खबरों को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। खबरों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन भाषा पहले की तुलना में बेहतर भी हुई है। अब छोटे-छोटे वाक्य लिखे जाते हैं और खबरों की भाषा अनौपचारिक है। औरतों पर होने वाले अत्याचार की भाषा में चिंता या आक्रोश के बजाय एक किस्म की रसलीनता दिखती है। धार्मिक समारोह, पर्व-त्योहार आदि के प्रति अखबारों में जगह बढ़ी है। आर्थिक खबरों का महत्व बहुत अधिक बढ़ा है। हिंदी क्षेत्र में शिक्षा और समृद्धि बढ़ी है, लेकिन साहित्य के पाठक कम हुए हैं।

इसी तरह हाशिये के लोगों की मौजूदगी भी कम से कम है। पहले जो विज्ञापन अखबारों के बीच के पृष्ठों पर होते थे, वे अब पहले पेज पर आ गए हैं। भूमंडलीकरण के साथ आई संचार क्रांति के औजारों का इस्तेमाल अखबार की साज-सज्जा पर बढ़ा है। अब फोटो, ग्राफिक्स और एनिमेशन आदि के मुताबिक खबरों को सजाया जाता है। लेखक के शोध का आधार ′नवभारत टाइम्स′ है, जिस पर भूमंडलीकरण का असर सबसे पहले दिखा और सबसे अधिक भी। लेकिन तथ्य यह भी है कि हिंदी के जिन अखबारों ने प्रसार के मामले में अंग्रेजी अखबारों को बेदखल किया, उनमें ′नवभारत टाइम्स′ नहीं है। इसलिए उदारीकरण और हिंदी अखबारों का कोई भी अध्ययन उन क्षेत्रीय अखबारों के विश्लेषण के बगैर पूरा नहीं होगा, जिनके कई राज्यों में संस्करण हैं। इसके बावजूद उदारीकरण और हिंदी अखबारों पर यह एक अत्यंत जरूरी किताब तो है ही।


(अमर उजाला के रविवार अंक में 15 सितंबर 2013 को  प्रकाशित)

Wednesday, 4 September 2013

समीक्षा: हिंदी में समाचार



रंगनाथ सिंह: इस किताब की अब तक काफी तारीफ हो चुकी है. इपंले (इन पंक्तियों का लेखक) इस किताब के लोकार्पण समारोह में शामिल था. लोकार्पण में मुख्य वक्ता थे प्रोफेसर वीर भारत तलवार, पत्रकार ओम थानवी, पत्रकार करन थापर और पत्रकार रवीश कुमार. मंच संचालन का जिम्मा भी एक भूतपूर्व पत्रकार अविनाश दास निभा रहे थे. जब एक प्रोफेसर, वो भी जनेवि का, और पाँच पत्रकार, सभी अग्रणी संस्थानों के, जिस किताब की भूरि-भूरि तारीफ कर चुके हों उस किताब पर कोई सार्वजनिक राय रखना थोड़ा मुश्किल है. यह मुश्किल तब और भी बढ़ जाती है जब लिखने वाला (इंपले) खुद न तो अनुभवी पत्रकार हो, न ही प्रोफेसर. अतः इंपले की इस कलमदराजी को एक पाठक की प्रतिक्रिया मात्र माना जाए. इंपले को यह भी लगता है कि अन्य जगहों पर इस किताब की अच्छाइयों का पर्याप्त जिक्र हो चुका होगा इसलिए इंपले का कर्तव्य बनता है कि इस समीक्षा में वह किताब की अच्छाई के इतर भी दो बातें कह सके.

मुझे उम्मीद है कि यह किताब सिर्फ प्रोफेसरों और पत्रकारों के लिए नहीं लिखी गई है.  अपने शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप में छपवाते समय अरविंद दास की नजर में सामान्य पाठक भी जरूर रहे होंगे. पूरी किताब नहीं, न सही, कम से कम किताब का सरल एवं सुंदर शीर्षक तो इस बात की पुष्टि करता है कि अरविंद को पाठकों का भी किंचित ख़्याल था. ये अलग बात है कि किताब ही तरह किताब का शीर्षक भी थोड़ा भ्रामक है.

किताब के शीर्षक से प्रतीत होता है कि यह क़िताब हिन्दी मीडिया का विश्लेषण करती है. यह पुस्तक ऐसा कत्तई नहीं करती है. ऐसा भी नहीं है कि यह किताब उन जाली किताबों की कड़ी में आई नई किताब है जिसे प्रकाशकों की माँग पर फेसबुक स्टेटसों को इकट्ठा करके लिखा गया है. यह पुस्तक एक शोध प्रबन्ध पर आधारित है. यह शोध किसी ऐसी-वैसी जगह से नहीं किया गया है. यह शोध प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अंतर्गत किया गया है. लेखक अरविन्द दास की सारी समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं. यह पुस्तक भी गंभीरता और अध्ययनशीलता के निकष पर खरी उतरती है फिर भी किताब समस्याग्रस्त है और इसकी समस्या बहुत ही बुनियादी है. 

इंपले की विनम्र राय है कि अरविंद दास इस शोध के प्रारूप को बनाने में ही चूक गए. यह पुस्तक मूलतः हिन्दी मीडिया पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव के अध्ययन का एक प्रयास है. अरविन्द दास पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि "...पीएचडी की थीसिस के लिए मैंने 'हिन्दी पत्रकारिता पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव' विषय को चुना था. यह किताब मेरे शोध प्रबन्ध का किंचित संशोधित रूप है."

किताब की सबसे बड़ी सीमा यही है कि यह हिन्दी पत्रकारिता के अध्ययन के लिए मात्र एक अखबार को आधार सामाग्री बनाया. वह अखबार है नवभारत टाइम्स उर्फ एनबीटी. भूमण्डलीकरण के प्रभाव को रेखांकित करने के लिए एनबीटी के 1986 और 2005 के अखबार का चयन किया है. वह भी चुने गए गए पृष्ठों के आधार पर. अरविंद ने लम्बे शोध अध्ययन में जिन परिवर्तनों को रेखांकित किया है उनमें से ज्यादातर परिवर्तनों के बारे में हिन्दी लोकवृत्त में अक्सर ही लिखा जाता है. अरविंद को उपलब्धि यह है कि उन्होंने इसके लिए कुछ तथ्य भी प्रस्तुत किए हैं. पाठकों की सुविधा के लिए कुछेक निष्कर्षों का जिक्र करना समीचीन होगा.  अरविंद ने एनबीटी के 1986 और 2005 के अखबारों के मुख्य पृष्ठ का अध्ययन करके बताया है कि 1986 में अखबार के मुख्य पृष्ठ पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी खबरों का बाहुल्य था. 2005 में एनबीटी के प्रथम पृष्ठ पर खेल और अर्थशास्त्र से जुड़ी खबरों का दबदबा था. 1986 में अखबार में सुगम कितु साहित्यिक प्रभाव वाली हिन्दी का बरताव होता था. 2005 में अखबार ने धड़ल्ले से हिंग्लिश का प्रयोग करना शुरू कर दिया.  टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह से जुड़े होने का कारण एनबीटी तकनीकी रूप से देश के दूसरे भाषाई अखबारों से आगे रहा है. लेखक के अनुसार भूमण्डलीकरण का प्रभाव अखबार के पहले पन्नों पर विज्ञापनों के प्रकाशन मे भी देखा जा सकता है.

महिलाओं से जुड़ी खबरों के मामले में एनबीटी 2005 में 1986 से बेहतर कवरेज करता है लेकिन धर्म के मामले में एनबीटी ने 2005 में ज्यादा हल्का रुख अपनाया. तीज-त्यौहारों के साथ ही धार्मिक अंधविश्वासों से जुड़ी खबरें भी 2005 में 1986 के मुकाबले बहुत ज्यादा प्रमुखता पाने लगी थीं. अरविंद दास ने एनबीटी के एक वरिष्ठ अधिकारों के हवाले से बताया है कि एनबीटी अपने रीडर्स को ध्यान में रखकर ही सामाग्री का चयन करता है और उस अधिकारी के अनुसार एनबीटी के रीडर मुख्यतः मध्यवर्गी हैं. इसलिए एनबीटी में किसानो और मजदूरों से जुड़ी खबरें सुर्खियों में अपवाद स्वरुप ही आती हैं. लेखक कहते हैं कि ऐसी खबरें पहले भी कम आती थी लेकिन 2005 आते-आते इनकी संख्या नगण्य हो गई.  किसानों और मजदूरों की तरह ही दलितों और आदिवासियों से जुड़ी खबरें भी एनबीटी की सुर्खिंयां अपवादस्वरूप ही बनती हैं. यही हाल साहित्य का भी है. 1986 में एनबीटी में साहित्य संबंधी खबरों का समुचित हिस्सा था. 2005 आते-आते साहित्य एनबीटी में हाशिए पर चला जाता है.

अरविंद ने 1986 और 2005 के सामग्री का जो भी विश्लेषण प्रस्तुत किया है उससे असहमत होने का सवाल नहीं है क्योंगि वो ठोस आंकड़ों पर आधारित हैं.

लेकिन अरविंद पूरी किताब में पाठकों को कहीं भी यह नहीं समझा पाए हैं कि वर्तमान में मात्र दो महानगरों तक सिमटे अखबार को हिन्दी समाचार पत्रों के प्रतिनिधि के रूप में कैसे स्वीकार किया जा सकता है. जबके देश में अंग्रेजी के अखबारों से ज्यादा बिकने वाले तीन प्रमुख अखबारों के सामाग्री विश्लेषण के बिना हिन्दी पत्रकारिता के बारे में कोई बात करना कैसे संभव है.

अरविंद पाठकों को यह समझाने में भी असफल रहे हैं कि भूमण्डलीकरण का प्रभाव किस तरीके से पड़ा. उनकी किताब से तो लगता है कि पूरी दुनिया में कोई हवा चली और उसके प्रभाव में एनबीटी वाले के नैतिक प्रतिमान बदल गए. यहाँ ध्यान देने की जरूरत है कि यदि टाइम्स समूह के हिन्दी अखबार में 1991 के बाद उल्लेखनीय बदलाव आए तो इसकी समूह के अंग्रेजी अखबार में कमोवेस ऐसे ही बदलाव आए थे. इसलिए इन बदलावों के हिन्दी जगत तक सीमित रहने वाली परिघटना मानना भी अनुचित होगा.

अपनी लेखनी को विराम देते हुए यह भी कहना चाहूँगा कि अरविंद इस किताब के उद्धरणों के अतिशय प्रयोग से परहेज करके इसे ज्यादा पठनीय बना सकते थे.

  (समकालीन तीसरी दुनिया, सितंबर 2013)

Sunday, 30 June 2013

हिंदी पत्रकारिता में संवेदनशीलता का अभाव

"पहले के समाचार पत्रों में खबरों का विभाजन नहीं था. पत्रकारिता साहित्य से हमेशा जुड़ी रही.  इसमें लेखक की संवेदना और चेतना महत्वपूर्ण होती थी. " बीते 11  मई को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर  में जेएनयू के प्रो. वीर भारत तलवार ने ये बातें कहीं.  अरविंद दास की पुस्तक 'हिंदी में समाचार' के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा, " इस पुस्तक में तमाम अंतर्विरोधो पर प्रकाश डाला गया है. इसमें एक ओर स्त्रियों के सशक्तिकरण के साथ-साथ उनके उत्पीड़न के अंतर्विरोध का विश्लेषण है."
लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तलवार ने कहा कि खबरों के प्रकार पर भी आपत्ति जाहिर की है. मसलन पिछले दिनों बलात्कार की खबरें जिस भाषा में लिखी गई, पुस्तक में उस भाषा के मर्दवादी रवैए की ओर संकेत किया गया है.  इसके साथ-साथ आज हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की कमी के मुद्दे को भी उठाया गया है.
करन थापर और वीर भारत तलवार
अंतिका प्रकाशन से आई अरविंद दास की पुस्तक को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के बदलाव की कहानी बताने वाली पुस्तक कहा है, जिसके जरिए सामाजिक परिवर्तन का इतिहास पता चलता है. कार्यक्रम में आईटीवी के अध्यक्ष करन थापर, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार भी मौजूद थे. करन थापर ने मीडिया के मौजूदा स्वरूप पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा, "आज मीडिया में टीआरपी हावी है. एक ही कार्यक्रमों या खबरों को बार-बार दिखाया जाता है. ऐसा लगता है जैसे देश-दुनिया में इसके अलावा कोई चर्चा का विषय है ही नहीं." थापर ने भाषा की गुणवत्ता में गिरावट आने की भी बात कही. उन्होंने अरविंद की पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें समाचार पत्रों का जिस प्रकार विश्लेषण किया गया है, उसी तरह आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी विश्लेषण होना चाहिए.  कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि अरविंद ने अपनी पुस्तक के जरिए हिंदी पत्रकारिता के कलेवर को मापने की कोशिश की है. भूमंडलीकरण की छाया कैसे संपादकों पर पड़ती है, यह पुस्तक इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन है. इसके साथ-साथ थानवी ने भाषा के हो रहे पतन और खबरों से विलुप्त हो रही संवेदना पर भी चिंता व्यक्त की. इस दौरान रवीश कुमार ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन मोहल्ल लाइव के अविनाश कर रहे थे.  

(प्रथम प्रवक्ता, 16-30 जून 2013, समाचार-विचार पाक्षिक)