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Tuesday, 2 February 2021

हिन्दी अखबारों में क्या छप रहा है

समीक्षक: हुसैन ताबिश

"भूमंडलीकरण के बाद अखबारों ने खबरों की नई परिभाषा गढ़ी है जिसका मतलब है - खुशखबरी। अखबार आहत करने वाली खबरों को छापने से बचते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अखबार यथास्थिति को बरकरार रखने में राज्य और सत्ता के सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। हिंदी के अखबार खबरों को शासक वर्ग के नजरिए से ही देखते और उसका विश्लेषण करते हैं।
ऐसे में अखबारों में मनोरंजन, फिल्म, क्रिकेट और सेंसेक्स की खबरें प्रमुखता पा रही हैं। वहीं किसानों की बदहाली, दलितों के उत्पीड़न और आदिवासियों की जंगल और ज़मीन से बेदखली सुर्खियां तो दूर अखबार के अंदर के पन्नों पर भी बमुश्किल ही जगह पाते हैं।

खबरें चुनिंदा वर्ग और समूहों तक सिमट गई है। अखबारों के आंतरिक ढांचे में भी इसी वर्ग के पुरुषों का वर्चस्व है।"
उपरोक्त अंश लेखक, शोधार्थी और वरिष्ठ पत्रकार अरविंद दास की पुस्तक " हिंदी में समाचार " के हैं। Antika प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है और ३९० रुपए की कीमत पर यह किताब Amazon पर उपलब्ध है।
६ अध्यायों में बंटी १९० पेज की यह किताब सीनियर रिसर्च फेलोशिप के तहत शोध और प्राथमिक आंकड़ों के आधार पर लिखी गई है।

किताब में हिंदी के अखबारों पर भूमंडलीकरण, उदारीकृत अर्थव्यवस्था और नव पूंजीवादी संस्कृति के प्रभावों का सम्यक अध्ययन किया गया है। यह राज्य सत्ता, कारपोरेट और समाचार पत्रों के अंतर्संबंधों की भी परतें खोलती है।
पुस्तक इस बात की गहन पड़ताल करती है कि आखिर कैसे अखबारों ने पाठकों की चिंता छोड़कर अपने ग्राहकों की तलाश कर ली है और यही उनके असली माई बाप बन गए हैं। पाठक की भूमिका सिर्फ एक खरीदार की है, और अखबार खबरों की आड़ में उन तक विज्ञापन पहुंचाने का एक जरिया भर है।

वर्ष १९९९ में बेनेट और कोलमैन कंपनी के उपाध्यक्ष भास्कर दास ने कहा था, " प्रिंट मीडिया के मुख्य खरीदार विज्ञापनदाता हैं जो इसका इस्तेमाल अपने खरीदारों तक पहुंचने के लिए करते हैं।"
खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण और उसके विशेष ट्रीटमेंट पर बाज़ार के दबाव और प्रबन्धन तंत्र के हस्तक्षेप का लेखक ने बारीकी से अध्ययन किया है। हिंदी के अखबारों में गांव, गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और स्त्रियों को लेकर उपेक्षा भाव की लेखक यहां शिकायत करता है।
किताब लिखती है, हिंदी अखबारों में स्त्री विमर्श में जहां स्त्रियों के शोषण, उत्पीड़न का जिक्र मिलता है, वहीं स्त्रियों के संघर्ष के बारे में, दलित स्त्रियों के दोहरे अभिशाप के बारे में एक किस्म कि चुप्पी दिखती है। जबकि महानगरीय उच्च और मध्यमवर्ग की महिलाओं और उनकी सफलता के किस्सों को अखबार बढ़ा चढ़ाकर पेश करता है।
लेखक इस बात से सहमति जताता है कि भूमंडलीकरण ने महिलाओं की देह, उसके श्रम, उसकी छवि, उसके सौन्दर्य और कमनीयता का अतीत के किसी भी काल के मुकाबले सर्वाधिक दोहन किया है। यहां पितृसत्ता मजबूत हुई है, जिसका साफ असर हिंदी अखबारों में दृष्टिगोचर होता है।

" ३० वर्षीय महिला हवस का शिकार बनी" , "बलात्कार के मामले में इस वर्ष रिकॉर्ड टूटा " बलात्कार का आंकड़ा ६०० के पार" खबरों की ऐसे हेडिंग बलात्कारी के कृत्य को उत्सव की तरह मानती प्रतीत होती है। ऐसी हेडिंग से बलात्कारी को दोषी मानने के बजाए पीड़ित महिला को दोषी मानने की बू आती है। ऐसी भाषा में मर्दवादी रवैया दिखाई देता है जो पुरुषों को ऐसी खबरों पर उद्देलित करने के बजाए, महिलाओं के उपभोग की ओर उन्मुख करती दिखती है।
किताब एक अन्य तथ्य की ओर इशारा करती है कि भारतीय राजनीति में पिछले दशक में हिंदुत्वादी ताकतों के उभार को भी हिंदी अखबारों ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया है। लगभग हर अखबार में साप्ताहिक रूप से धर्म और कर्मकांड से संबंधित ऐसी खबरें भी छपती है जो धर्म और अध्यात्म से ज़्यादा अंधविश्वास को बढ़ावा देती है।
किताब में हिंदी अखबारों की भाषाई परिवर्तन पर भी गहनता से प्रकाश डाला गया है। लेखक ने लिखा है, चूंकि भूमंडलीकरण की भाषा इंग्लिश है इसलिए इसकी गिरफ्त में आकर अखबार की भाषा भी " हिंग्रेजी " हो गई है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार में हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूंस ठूंसकर हिंदी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम चल रही है और हिंदी के अखबार हिंग्रेजी का प्रयोग कर इस मुहिम को ताकत दे रहे हैं।
यहां लेखक ने जिन मुद्दों पर बात की है, वो कोई नया विषय नहीं है। मीडिया विश्लेषक और आलोचक इन मुद्दों पर बात करते रहे हैं। इन विषयों पर ढेर सारी रिपोर्ट, आर्टिकल और कुछ किताबें भी बाज़ार में उपलब्ध है।
हालांकि बाज़ार में दिलीप मंडल, विनीत कुमार जैसे लेखकों की जी किताबें हैं उनमें मीडिया के कारपोरेट चरित्र की बात ज़्यादा की गई है। इस पुस्तक की उपयोगिता इस बात में है कि इसमें कंटेंट के स्तर पर ज़्यादा बात की गई है। जो तथ्य लिखे गए हैं वो पूरी तरह शोध आधारित है।

पुस्तक में एक कमी खलती है जो काफी सामान्य है और तमाम पुस्तकों और शोध प्रोजेक्ट में इसकी उपेक्षा दिखती है। अखबार के कंटेंट को लेकर संपादकों के अलावा मलिकान और प्रबंधकों का पक्ष नहीं लिखा गया है। इनके बिना अखबार उद्योग या उसके कंटेंट पर कोई भी विमर्श अधूरा ही रह जाता है। अखबार का जो कंटेंट analysis किया गया है अगर इसमें हिंदी के किसी दूसरे अखबार या फिर अंग्रेजी के भी एक अखबार को शामिल कर तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया जाता तो विषय को समझने में और आसानी होती। पाठक हिंदी अंग्रेज़ी या फिर हिंदी के ही दो अखबारों का भेद समझ पाता। नव भारत टाइम्स जैसे दिल्ली से छापने वाले अखबारों की ये मज़बूरी भी हो सकती है कि वो अपने पाठकों के लिहाज से अपनी खबरों में गांव, किसान, मजदूर और आदिवासियों की खबरों को प्राथमिकता नहीं देता हो। इस किताब के अध्ययन में राज्यों की राजधानी से निकलने वाले या किसी कस्बाई संस्करण के अखबार को शामिल करना इसके महत्व को और बढ़ा सकता था।
फिर भी ये किताब पत्रकारिता में रुचि रखने वाले पाठकों के साथ - साथ पत्रकारिता के छात्रों, अध्यापकों और अखबार के नीति निर्धारकों को पढ़नी चाहिए। पत्रकारिता के विषयों पर शोध करने वाले उन शोधार्थियों को ये किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए जिनका शोध content analysis or observation method पर आधारित हो।
वो इस किताब से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

Friday, 3 January 2014

आलोचक की पसंद: हिंदी में समाचार



 शुक्रवार, 3 जनवरी, 2014 को 11:47 IST तक के समाचार

हिन्दी का कथेतर गद्य, किताबें 2013

कथेतर हिन्दी गद्य की बारहा आलोचना होती रही है. एक तो औपनिवेशिक शासन से निकले तीसरी दुनिया के एक ऐसे देश की भाषा जिसको लेकर भांति-भांति के रगड़-झगड़ हैं, दूजे कहानी-कविता की तुलना में वैचारिक गद्य पढ़ने वालों की क्षीण संख्या, कथेतर हिन्दी गद्य की दुबली काया इन दोनों चिंताओं से कब उबर पाएगी, पता नहीं.
हिन्दी में उल्लेखनीय कथेतर गद्य आता भी कम है, उसे स्वीकारा और सहेजा भी कम जाता है. बहरहाल, प्रस्तुत है साल 2013 में प्रकाशित हिन्दी की किताबों की तीसरी किस्त, आलोचकों की पसंद.

अपूर्वानंद


अपूर्वानंद, हिन्दी लेखक
अपूर्वानंदः दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर. आलोचना कृति 'सुंदर का स्वप्न' और 'साहित्य का एकांत' प्रकाशित.

मुझसे गुजरे साल में हिंदी की कथेतर पुस्तकों में से एक चयन पेश करने को कहा गया है. ज़ाहिर है, यह मेरा अपना चुनाव है. ये पुस्तकें श्रेष्ठ हैं, यह दावा नहीं क्योंकि श्रेष्ठता का निर्धारण एक या दो साल के भीतर नहीं हो जाया करता. ख़ासकर किताबों के मामले में, जिन्हें अपना असर या छाप छोड़ने के लिए लिए वक़्त की दरकार होती है.
कथेतर कहने के बाद एक पाबंदी और है कि इस चयन में कविता को शामिल नहीं किया जाएगा. फिर भी इसका दायरा बहुत बड़ा ही रहता है. इसके भीतर आलोचना, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, शिक्षा, समाज अध्ययन, राजनीति, आदि जैसी अनेक विधाएँ शामिल हैं.

  • चूड़ी बाजार में लड़की- कृष्ण कुमार, राजकमल प्रकाशन
कृष्ण कुमार की किताब विषय के महत्व के अलावा अपने गद्य के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. चूड़ी के बिना हिन्दुस्तानी लड़की की कल्पना करना कठिन है. चूड़ी पहन कर घर बैठो-जैसी लानत की लोकप्रियता से यह अंदाज भी मिलता है कि दरअसल लड़की का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध कायरता, भीरुता या निकम्मेपन के भावों के साथ हिन्दुस्तानी मन में है. क्या कहना होगा कि यह मन पुरुष मन ही है! कृष्ण कुमार चूड़ी उद्योग के लिए मशहूर फ़िरोज़ाबाद की दस साल पुरानी यात्रा के अपने और अपनी छात्राओं के अनुभवों के आधार पर लड़की के बनने की कथा रचते हैं. एकाध अंश देखिए :
“देह के अलग-अलग अंगों का ... अनुभव इसे इसी अर्थ में स्त्री का विशिष्ट अनुभव बनता है .... देखने वालों, ख़ासकर देखने वाले पुरुषों, जिनकी दृष्टि के स्पर्श की अवधारणा लड़कियों के स्त्री बनने की सामाजिक प्रक्रिया को समझने का एक महत्वपूर्ण औज़ार है.....”. एक और अंश: “लड़की अथवा औरत के संदर्भ में ‘नाज़ुक कलाई’ का ज़िक्र पूर्णतः एक सामाजिक कर्म के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि कलाई के जोड़ को सुरक्षित और मजबूत रखने की चुनौती किसी टकराव के समय पुरुष और स्त्री दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए.”
इस किताब को पढ़ने के लिए मेहनत की ज़रूरत भी है, लेकिन वह करना हिंदी पाठक के लिए गुणकारी ही होगा.

  • 'सूरदास', रीतिकाव्य- नंद किशोर नवल, राजकमल प्रकाशन
नंदकिशोर नवल हिंदी के परिचित आलोचक हैं. यह बताना ज़रूरी है इस स्तम्भ के पाठकों को कि वे मेरे श्वसुर हैं. इसलिए काफ़ी देर तक मैं उनकी किताबों के उल्लेख को लेकर द्वंद्व में पड़ा रहा. लेकिन इस आश्वस्ति के साथ और बाद कि हिंदी के पाठक जगत में वह पहले से जाने जाते हैं, मैं उनकी इस साल आई दो किताबों का ज़िक्र करना चाहता हूँ.
एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में अपने लेखकीय जीवन का पूर्वार्ध बिताने के बाद नवलजी को इस विशेषण के ग़ैर ज़रूरी होने का अहसास होने लगा, यह उत्तरार्ध के उनके लेखन में विचारधारात्मक के स्थान एक साहित्यिक दृष्टि के संधान के उद्यम से जाना जा सकता है. साहित्य सबसे पहले आनंद के लिए पढ़ा जाता है. पर यह आनंद क्या है और एक व्यक्ति पाठक का किसी किसी रचना का अनुभव सामाजिक महत्व कब ग्रहण करता है, यह आलोचना का प्रश्न है.
बहरहाल! पिछले कुछ वर्षों में नंदकिशोर नवल मध्यकालीन रचनाकारों की ओर मुड़ गए हैं. 2012 में ‘आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास’ के बाद इस साल उनकी ये दो किताबें आई हैं. नवलजी इन्हें आस्वादपरक आलोचना कहते हैं. इन कवियों पर किसी नए शोध की अपेक्षा के साथ इन किताबों को पढ़ने पर निराशा होगी. कवियों के संपूर्ण अध्ययन का दावा यहाँ नहीं है. किसी विश्लेषणात्मकता का भी नहीं. एक तरह से ये साहित्य से पके नेत्रों से की गई पाठकीय यात्रा के दो पड़ाव हैं. साहित्यिक पाठ के पुनरुद्धार में ये कितनी कामयाब हुई हैं, इन्हें पढ़ कर ही जाना जा सकता है.

  • हिंदी रंगमंच की लोक धारा- जावेद अख़्तर ख़ान, वाणी प्रकाशन
हिन्दी रंगमंच की आधुनिकता के क्या मायने हैं? क्या वह तभी आधुनिक हो पाता है जब वह साक्षरता और आधुनिक शिक्षा पर आधारित सामाजिक संस्कारों से लैस हो लेता है? क्या उसकी आधुनिकता का अर्थ एक लिखित संस्कृति की भाषा और मुहावरे में ही समझा जा सकता है? क्या वह पूर्ववर्ती मौखिक सांस्कृतिक रूपों से अपनी विच्छिन्नता की घोषणा के बग़ैर वह आधुनिक नहीं हो सकता?
और क्या अलिखित भाषिक या मौखिक लोक सांस्कृतिक रूपों में अभिव्यक्त रंग परम्परा किसी एक विशेष काल-बिंदु पर आकर लुप्त हो जाती है? उसे आधुनिक का पूर्ववर्ती कहना कितना उचित है? क्या पारम्परिक 'अशिक्षित' समाज की अभिव्यक्तियाँ मात्र इस अर्थ में उपयोगी हैं कि आधुनिकता अपनी शर्तों पर उनका प्रयोग कर सके? फिर भिखारी ठाकुर आधुनिक हैं या नहीं? या, हबीब तनवीर के रंगमंच को क्या आधुनिक विषय-वस्तु और पारंपरिक लोक-रूप का संगम मान लें? जावेद अख़्तर अपनी इस किताब में वास्तविक रंग प्रसंगों और अनुभवों की रौशनी में इन सवालों पर विचार करते हैं. भाषा का मज़ा आपको मिलेगा, बातचीत का ज़िन्दा अंदाज़.
मगहर’ पत्रिका का दलित बचपन पर केन्द्रित अंक- संपादक: मुकेश मानस
अंत में मैं पिछले साल के आरम्भ में पुस्तक मेले से ख़रीदी इस पत्रिका का ज़िक्र किताब की श्रेणी में करना चाहूँगा. भारत में मनोविज्ञान अब तक भारतीय बचपन का अपना सिद्धांत नहीं बना पाया है. हमारे पास बचपन को समझने की सारी सैद्धांतिक श्रेणियाँ पश्चिमी अनुभवों से ली गई हैं. भारतीय बचपन भी क्या एक है? सवर्ण और दलित बच्चों के मन क्या एक से हैं?
हिन्दू और मुस्लिम बच्चों के अनुभव कितने समान हैं और कितने अलग? दलित आत्मकथाएँ हमेशा वयस्क अनुभवों की तरह पढ़ी जाती हैं. तकरीबन पैंतीस स्त्री-पुरुष लेखकों ने अपने बचपन की कथाएं कही हैं जो अपनी वर्णनात्मकता के कारण पढ़ी जानी चाहिए. यह संग्रह मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों के साथ साहित्य के पाठकों के लिए ऐसी खान है, जिसमें उतरे बिना वे भारतीय मन के निर्द्वंद्व आख्यान का पाखण्ड पहचान नहीं पाएंगे.

बजरंग बिहारी तिवारी


बजरंग बिहारी तिवारी,हिन्दी आलोचक
बजरंग बिहारी तिवारीः 'भारतीय साहित्य:एक परिचय’(२००५) संपादन-अंजना नीरा देव तथा सनम खन्ना, यथास्थिति से टकराते हुए(द्विभाषिक): दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियां’ (२०१२) संपादन-अनिता भारती के साथ. ’यथास्थिति से टकराते हुए: दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कविताएं’ (२०१३) संपादन-अनिता भारती के साथ.
इस वर्ष हिन्दी आलोचना विधा में ऐसी कोई किताब मेरे देखने में नहीं आयी जिससे साहित्य परिदृश्य में किसी बुनियादी मान्यता पर पुनर्विचार की आवश्यकता शिद्दत से महसूस हो. लेकिन अलग-अलग कारणों से चार किताबों का उल्लेख करना चाहूंगा.

  • भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ- कर्मेंदु शिशिर, नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली.
नवजागरण संबंधी बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास और हिन्दी नवजागरण को तुलनात्मक सन्दर्भों में रखने की अच्छी कोशिश. हिन्दीवाद का आग्रह नहीं.

  • दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ- ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
हिन्दी दलित साहित्य के संस्थापकों में से एक ओमप्रकाश वाल्मीकि का महत्त्वपूर्ण आलोचना ग्रन्थ. दलित साहित्य की कई भीतरी दिक़्क़तों की जानकारी इससे मिलती है. आत्मालोचन की ज़रूरत का रेखांकन. साहित्य में पसरे जातिवाद का संज्ञान.

  • समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
दलित स्त्रीवाद की बनती वैचारिकी और जीवन-दृष्टि को समझने में सहायक किताब. पितृसत्ता के दलित संस्करण की साहसिक समीक्षा.

  • प्रेमचंद और दलित विवाद- (संपा)सुधीर प्रताप सिंह, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली.
हिन्दी के समाज विमर्श में प्रेमचंद की केन्द्रीयता और जातिवादी मानसिकता की गहराई को जांचा गया है. अस्मितावाद के संकरे दायरे को इस किताब के कई लेख बखूबी उजागर करते हैं.

संजीव कुमार


संजीव कुमार, हिन्दी आलोचक
संजीव कुमारः आलोचक, कहानीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में हिन्दी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर.
साल २०१३ में कथेतर गद्य की जो किताबें पढ़ पाया हूँ उनमें से उल्लेखनीय किताबें इस प्रकार हैं.

  • शब्द और देशकाल- कुंवर नारायण, राजकमल प्रकाशन
यह कुंवर नारायण के लेखों और व्याख्यानों का संकलन है. कुंवर जी साहित्य के अंतर्विषयक उपागमों से लेकर संगीत, सिनेमा और अन्य कलाओं तक पर जितने अनायास ढंग से कलम चलाते हैं, वह अद्भुत है.
इससे इनकार नहीं कि किताब में कुछ चीज़ें भर्ती की भी हैं, मसलन आधे-आधे पृष्ठ की 'निजी और सामाजिक' 'युद्ध और कविता' जैसी टिप्पणियाँ. पर साठ फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा सूचना और विचार की दृष्टि से समृद्ध है .

  • वे हमें बदल रहे हैं- (संपा)बलवंत कौर, सामयिक प्रकाशन
यह 'हंस' के पिछले कुछ समय के सम्पादकीयों (लेखक - राजेंद्र यादव) का संकलन है . मृत्यु से पूर्व राजेंद्र जी की आख़िरी किताब. इन सम्पादकीय टिप्पणियों में उनका तेवर पहले की तुलना में बदला हुआ है. तीखापन और आक्रामकता कम है, हताशा का स्वर हावी है. पर विश्लेषण की धार और चीज़ों को देखने का 'रैडिकल' तरीक़ा तो वैसा ही है.

  • निराशा में भी सामर्थ्य- पंकज चतुर्वेदी, आधार प्रकाशन
यह पंकज की आलोचनात्मक और सामयिक टिप्पणियों-लेखों का संग्रह है. पंकज स्थापित मान्यताओं से आतंकित होने वाले पाठक-आलोचक नहीं हैं और उनमें एक तरह की सबवर्सिव कार्रवाई करने का दुस्साहस है जो उन्हें पठनीय बनाता है. शोधपरक लेखों से लेकर सामयिक विषयों पर लिखी गयी टिप्पणियों तक, हर जगह आपको बारीकी के साथ कहने का अंदाज़ और आर्टिकुलेशन मिलेगा .

  • हिंदी में समाचार- अरविन्द दास, अंतिका प्रकाशन
उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी प्रिंट-मीडिया के साथ क्या हुआ, इसकी शोधपरक पड़ताल. अरविन्द ने बाक़ायदा प्राविधि का पालन करते हुए इस काम को अंजाम दिया है. बदलाव और निरंतरता, दोनों को रेखांकित करने वाली यह किताब पिछले साल छपी 'मंडी में मीडिया' (विनीत कुमार) के साथ रख कर पढ़ी जानी चाहिए.

  • केंद्र में कहानी- राकेश बिहारी, शिल्पायन प्रकाशन
पिछले लगभग बीस सालों की कहानी पर, जिसे राकेश 'भूमण्डलोत्तर पीढ़ी' कहते हैं, यह एक क़ायदे की किताब है. उनके 'कैनन' को लेकर कुछ कुछ शिकायतें इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) की भी हैं, कहानी को सिर्फ लेखकीय अभिमत के रूप में पढ़ने सराहने की पद्धति से भी थोड़ा असंतोष है, पर राकेश का अध्ययन व्यापक और विश्लेषण तीक्ष्ण है. उनका लेखन हिंदी कहानी पर बहस करने के लिए उकसाता है, इसे किसी किताब की बड़ी उपलब्धि मानना चाहिए.

  • समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन
दलित नारीवाद की स्थापित दलित विमर्श और स्त्री विमर्श से बहुत वाजिब शिकायतें रही हैं. अनिता भारती के लेखन में ये शिकायतें धारदार रूप में आती रही हैं. यह उनके ऐसे ही लेखों का संकलन है. साहित्य को सामाजिक प्रश्नों के साथ जोड़ कर देखने वालों के लिए एक ज़रूरी किताब.

Sunday, 30 June 2013

हिंदी पत्रकारिता में संवेदनशीलता का अभाव

"पहले के समाचार पत्रों में खबरों का विभाजन नहीं था. पत्रकारिता साहित्य से हमेशा जुड़ी रही.  इसमें लेखक की संवेदना और चेतना महत्वपूर्ण होती थी. " बीते 11  मई को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर  में जेएनयू के प्रो. वीर भारत तलवार ने ये बातें कहीं.  अरविंद दास की पुस्तक 'हिंदी में समाचार' के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा, " इस पुस्तक में तमाम अंतर्विरोधो पर प्रकाश डाला गया है. इसमें एक ओर स्त्रियों के सशक्तिकरण के साथ-साथ उनके उत्पीड़न के अंतर्विरोध का विश्लेषण है."
लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तलवार ने कहा कि खबरों के प्रकार पर भी आपत्ति जाहिर की है. मसलन पिछले दिनों बलात्कार की खबरें जिस भाषा में लिखी गई, पुस्तक में उस भाषा के मर्दवादी रवैए की ओर संकेत किया गया है.  इसके साथ-साथ आज हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की कमी के मुद्दे को भी उठाया गया है.
करन थापर और वीर भारत तलवार
अंतिका प्रकाशन से आई अरविंद दास की पुस्तक को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के बदलाव की कहानी बताने वाली पुस्तक कहा है, जिसके जरिए सामाजिक परिवर्तन का इतिहास पता चलता है. कार्यक्रम में आईटीवी के अध्यक्ष करन थापर, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार भी मौजूद थे. करन थापर ने मीडिया के मौजूदा स्वरूप पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा, "आज मीडिया में टीआरपी हावी है. एक ही कार्यक्रमों या खबरों को बार-बार दिखाया जाता है. ऐसा लगता है जैसे देश-दुनिया में इसके अलावा कोई चर्चा का विषय है ही नहीं." थापर ने भाषा की गुणवत्ता में गिरावट आने की भी बात कही. उन्होंने अरविंद की पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें समाचार पत्रों का जिस प्रकार विश्लेषण किया गया है, उसी तरह आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी विश्लेषण होना चाहिए.  कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि अरविंद ने अपनी पुस्तक के जरिए हिंदी पत्रकारिता के कलेवर को मापने की कोशिश की है. भूमंडलीकरण की छाया कैसे संपादकों पर पड़ती है, यह पुस्तक इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन है. इसके साथ-साथ थानवी ने भाषा के हो रहे पतन और खबरों से विलुप्त हो रही संवेदना पर भी चिंता व्यक्त की. इस दौरान रवीश कुमार ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन मोहल्ल लाइव के अविनाश कर रहे थे.  

(प्रथम प्रवक्ता, 16-30 जून 2013, समाचार-विचार पाक्षिक)