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Friday, 28 February 2014

खबरों की परिभाषा बदली

स्वप्निल सिंह, शोधार्थी, सामााजिक पद्धति अध्ययन संस्थान, जेएनयू: पिछले दो दशकों में भारतीय पत्रकारिता, खास कर भाषाई पत्रकारिता ने जिस तरह से भारतीय समाज को प्रभावित किया है उस रूप में इसे अध्ययन का विषय नहीं बनाया गया. इस लिहाज से हिंदी पत्रकारिता को लेकर हाल ही में अंतिका प्रकाशन से छपी इस शोध आधारित पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए.  

इस पुस्तक में लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता में आए बदलाव और उस पर पड़े प्रभावों का आकलन किया है.  भूमंडलीकरण की विस्तृत व्याख्या के बाद किताब में नवभारत टाइम्स, दिल्ली के अखबार को आधार बना कर सामग्री विश्लेषण की पद्धति से विषय विस्तुओं की पड़ताल की गई है.  भूमंडलीकरण के दौर में पूंजीवाद एक जीवन मूल्य के रूप में स्थापित हो गया है. इसके केंद्र में मुनाफा है. अब खबर एक सूचना ना होकर खुद उत्पाद है, जिसे उपभोक्ता को बेचा जा रहा है. सुर्खियों में अब राजनीति या अंतरराष्ट्रीय समाचार के बदले खेल और कारोबार को ज्यादा स्पेस दिया जा रहा है. स्त्रियों के प्रति हिंसा को भी इस भाषा में प्रस्तुत किया जाता है कि सनसनी पैदा हो. लेखक ने एक जगह नोट किया है- अखबारों के स्त्री विमर्श में जहाँ स्त्रियों के शोषण उत्पीड़न का जिक्र मिलता है वहीं स्त्री के संघर्ष के बारे में एक तरह की चुप्पी है. साथ ही किताब में उदाहरणों के जरिए यह बखूबी दिखाया गया है कि किस तरह स्त्रियों से संबंधित खबरों को पुरुषवादी नजरिए से पाठकों को प्रस्तुत किया जा रहा है. इसकी एक वजह पत्रकारिता की संरचना में स्त्रियों की कम उपस्थिति भी है.

पुस्तक दिखाती है कि किस तरह से भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी आम जनों से कटती जा रही है और बाजार के सुर में सुर मिला कर हिंग्रेजी को अपना रही है. एक तरफ बाजार ने जहाँ हिंदी अखबारों को गाँव-कस्बों तक पहुँचा दिया है वहीं खुद भी वह बाजार के चपेट में आई है.

हिंदी पत्रकारिता के पेज, ले आउट और डिजाइन के क्षेत्र जहां भूमंडलीय तकनीक के बदौलत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं, वहीं विषय वस्तु को लेकर ये बात नहीं कही जा सकती है. हिंदी के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में भी बौद्धिक बहस-मुबाहिसा का स्थान सिकुड़ता चला रहा है. पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में हिंदी पत्रकारिता ने हाशिए के समाज को एक आवाज दी है. जिसे लेखक ने किताब में रेखांकित भी किया है. पर लेखक की चिंता भूमंडलीकरण के दौर में धर्म के बाजारीकरण की भी है. किताब के माध्यम से यह बात सामने आती है कि अखबारों के लिए आस्था का नकदीकरण जैसे एक मजबूरी बन गई है. लेखक ने अखबार को उद्दृत करते हुए लिखा है-हम सब उत्सव प्रेमी हैं. उत्सवधर्मी है हमारा देश. यहाँ हर दिन एक त्योहार है और हर पत्थर एक देवता. पढ़िए इस जीवन, समाज और इसकी आस्था के बारे में हर सोमवार हमारे उत्सव पृष्ठ पर.

पुस्तक में इस अवधारणा की पड़ताल की गई है कि पिछले दो दशकों से किसान, मजदूर, दलित और आदिवासी को लेकर अखबारों का क्या रूख रखा है.  ना तो पहले ये अखबारों के लिए खबर थे ना ही आज. पिछले कुछ सालों में हिंदी अखबारों में दलितों के लेकर जो विमर्श सामने आ रहे हैं जो एक तरह से सर्व व्यापी बाजार के पक्ष में ही है. अपने पत्रकारिता के अनुभव का इस्तेमाल कर लेखक ने किताब में विस्तृत ढंग से इसका विश्लेषण किया गया है. 

हिंदी भले ही सत्ता की भाषा बनके उभरी हो, पर हिंदी पत्रकारिता की पहुँच सत्ता तक उस रूप में नहीं है जिस रूप में अंग्रेजी की है. आने वाले समय में हिंदी अखबार समाज में किस रूप में अपनी पहचान कायम रख पाते हैं यह उसकी विचारधारा और बाजार के संबंध से ही परिभाषित होगा.  पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के साथ-साथ भारतीय राज्य और समाज के साथ मीडिया के संबंधों को लेकर जिज्ञासुओं के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है.

(भारतीय समाजशास्त्र समीक्षा (शोध पत्रिका), जनवरी-मार्च 2014 में प्रकाशित, पेज 144-145)

Saturday, 8 February 2014

संकुचन का समाचार

  प्रांजल धर,  जनसत्ता, 9 फरवरी 2014:  अरविंद दास की पुस्तक हिंदी में समाचार पत्रकारिता के तमाम विचलनों, दबावों और बदलावों का वर्णन-विश्लेषण करती है। इसमें इस बात का नोटिस लिया गया है कि समाज की जिन संस्थाओं पर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है, उनमें से पत्रकारिता भी एक है। जो काम पहले मिशन था, वह बाद में व्यवसाय बना और आज उसकी दशा-दिशा क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। पुस्तक में सामग्री विश्लेषण पर तीन अध्याय हैं जो स्त्री, धर्म, अर्थतंत्र, साहित्य, खेल, किसान, मजदूर और दलित-आदिवासियों के संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों और दशकों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं।

भूमंडलीकरण की वर्तमान अवस्था में उभरे पितृसत्ता के नए रूपों की छवि भी हिंदी अखबारों में दिखाई पड़ती है। हमारी पत्रकारिता में महिलाओं की दशा क्या है, इसका अंदाजा इस पुस्तक से मिलता है। भारत में स्त्री-संघर्ष का इतिहास देश की राजनीतिक, सामाजिक, मजदूर और दलित आंदोलन से संबद्ध रहा और उससे समय-समय पर प्राणवायु हासिल करता रहा है। ऐसे में इस बात की जांच गहराई से किए जाने की दरकार है कि भूमंडलीकरण के बाद अखबारों में किस स्त्री की छवि को परोसा जा रहा है? और क्या स्त्रियों को उतनी आजादी हासिल है, जितनी पुरुषों को, इस सवाल से पत्रकारिता को जूझने की जरूरत है।
पहले जहां अखबार स्त्रियों के संदर्भ में स्वतंत्रता पर, कुटीर उद्योग या फिर महिलाओं की असल समस्याओं पर लिखते थे, वहीं आज सिखाया जाता है किदुल्हन वही जो प्रतियोगिता जीत जाए अपनी पुस्तकहिंदी में समाचारमें अरविंद ऐसी तमाम बुनियादी बातों की तह तक जाते हैं और पिछले काफी समय से चल रहे स्त्री-हिंसा, यौन शोषण या दलित-शोषण का सार्थक जायजा लेते हैं।
पत्रकारिता में प्रबंधकों और संपादकों के आपसी संबंधों के साथ-साथ मालिकों को लेकर भी यह पुस्तक थोड़ा-बहुत विमर्श करती है। समाचार माध्यमों में स्वामित्व की बात करें तो कुछ गंभीर चिंताएं सामने आती हैं। भारतीय समाचार उद्योग के विस्तार और विकास के बावजूद खिलाड़ियों की संख्या सिर्फ घटी, बल्कि एक ओर मीडिया परिदृश्य निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है और दूसरी ओर पब्लिक स्फीयर का क्षेत्रफल भी घट रहा है। इसका असर वैचारिक बहुलता और पाठकों तक पहुंचने वाली खबरों की विविधता पर सीधा पड़ रहा है।
यह छिपी बात नहीं है कि बड़ी पूंजी के जरिए अनेक ऐसे लोग अखबारों और टीवी चैनलों समेत विभिन्न समाचार माध्यमों के मालिक और नियंता बने बैठे हैं, जिन्हें पत्रकारिता के पेशे और उसकी नैतिकता से ज्यादा चिंता इस बात की है कि अपने आप को सुरक्षित कैसे किया जाए। आज ऐसी आशंका जताई जा रही है कि बड़ी पूंजियों के दबाव में छोटे और मंझोले खिलाड़ियों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल होता जाएगा। इसमें किसी आश्चर्य की बात इसलिए नहीं है, क्योंकि पूंजी का चरित्र ही ऐसा होता है, जहां बड़ी पूंजी छोटी पूंजी को निगल जाती है। समाचार माध्यमों के स्वामित्व के संदर्भ में आज भारतीय ही नहीं, पश्चिमी समाचारपत्र जगत में भी ऐसी बहसें बेहद आम हो चली हैं कि क्या अखबारों के स्वामित्व में संकेंद्रण बढ़ रहा है? यह संकेंद्रण विचारों का उपवन कहे जाने वाले पब्लिक स्फीयर और पत्रकारीय प्रतिबद्धता के लिहाज से अच्छा या सराहनीय बिल्कुल नहीं है।
समाचारों के संदर्भ मेंएक्टिव रिपोर्टरनामक अपनी चर्चित किताब में लेविस जेम्स ने जिस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं को अखबारों की आत्मा माना है, उस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं की कमी भी अखरने वाली बात है। असल में यह पेज-थ्री पत्रकारिता का दुष्प्रभाव ही है। वर्तमान समय में उन्हीं हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या ज्यादा है, जो अंग्रेजी में निकलने वाले प्रतिष्ठित अखबारों के सहायक अखबारों के रूप में निकल रहे हैं। इसे हिंदी अखबारों के दुर्भाग्य और अवांछित विकास के तौर पर लिया जाता है। कहा जाता है कि हिंदी अखबार, अंग्रेजी अखबारों के सांचे में ढल कर उनका प्रतिरूप, या प्रकारांतर से पिछलग्गू, बनते जा रहे हैं। ऐसे अनेक कोणों पर अरविंद विचार करते हैं, पर यह विचार-विश्लेषण और भी ज्यादा गहरा हो सकता था।
हालांकि यह पुस्तक अंग्रेजी मीडिया के साथ-साथ प्रसंगवश बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान का भी विश्लेषण करती चलती है, पर सवाल है कि क्या हिंदी की जनता अंग्रेजी कीपब्लिकवाले जीवन मूल्यों और समाचार-मूल्यों को बिना किसी हिचक के स्वीकार कर पाने की स्थिति में चुकी है? यहां आकर पत्रकारीय सरोकारों के सिकुड़ते चले जाने का सवालभारतऔरइंडियाके बीच पसरे विशाल अंतरों से जुड़ जाता है। स्वामित्व के इस संकेंद्रण का ही दुष्प्रभाव है कि इस समयआजजैसा महत्त्वपूर्ण हिंदी अखबार भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
हिंदी भाषा के संदर्भ में उत्तर प्रदेश को भले भारत का हृदयस्थल यानी हार्टलैंड कहा जाता रहा हो, लेकिन यहां भीएनआइपी’, ‘अमृत प्रभात’, ‘आज’, ‘स्वतंत्र भारत’, ‘स्वतंत्र चेतना’, ‘जनवार्ताऔरजनमोर्चाजैसे कई अखबार या तो बंद हो गए या फिर हाशिये पर चले गए हैं। कुछ तो किसी तरह चल रहे हैं, लेकिन उनकी आयु ज्यादा लंबी नहीं है। और फिर बात केवल बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे एक-दो राज्यों की ही नहीं है। राजस्थान की बात करें तो वहां भीनवज्योतिका ग्राफ नीचे जा रहा है और यही हाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मेंनवभारतऔरदेशबंधुका है।
आज के मीडिया विश्लेषण स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी किसी एक या दो बड़े मीडिया समूहों का स्पष्ट प्रभुत्व भले दिखता हो, लेकिन विभिन्न भाषाई क्षेत्रों या राज्यों में एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां साफ देखी जा सकती हैं। भारत में कम से कम छह ऐसे राज्य हैं, जहां एक बड़ी मीडिया कंपनी का बढ़ता दबदबा स्पष्ट रूप से नजर आता है। इन सब मुद्दों पर और भी गंभीर रोशनी डाली जा सकती थी। परिशिष्ट में यह विज्ञापनों पर विमर्श के साथ-साथ प्रभाष जोशी का साक्षात्कार और अनेक वरिष्ठ लोगों से बातचीत भी प्रस्तुत करती है। इसे लिखने के क्रम में लेखक ने खासा क्षेत्रीय कार्य किया है।
हिंदी में समाचार: अरविंद दास; अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-2, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद, उप्र; 390 रुपए।

Sunday, 30 June 2013

हिंदी पत्रकारिता में संवेदनशीलता का अभाव

"पहले के समाचार पत्रों में खबरों का विभाजन नहीं था. पत्रकारिता साहित्य से हमेशा जुड़ी रही.  इसमें लेखक की संवेदना और चेतना महत्वपूर्ण होती थी. " बीते 11  मई को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर  में जेएनयू के प्रो. वीर भारत तलवार ने ये बातें कहीं.  अरविंद दास की पुस्तक 'हिंदी में समाचार' के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा, " इस पुस्तक में तमाम अंतर्विरोधो पर प्रकाश डाला गया है. इसमें एक ओर स्त्रियों के सशक्तिकरण के साथ-साथ उनके उत्पीड़न के अंतर्विरोध का विश्लेषण है."
लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तलवार ने कहा कि खबरों के प्रकार पर भी आपत्ति जाहिर की है. मसलन पिछले दिनों बलात्कार की खबरें जिस भाषा में लिखी गई, पुस्तक में उस भाषा के मर्दवादी रवैए की ओर संकेत किया गया है.  इसके साथ-साथ आज हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की कमी के मुद्दे को भी उठाया गया है.
करन थापर और वीर भारत तलवार
अंतिका प्रकाशन से आई अरविंद दास की पुस्तक को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के बदलाव की कहानी बताने वाली पुस्तक कहा है, जिसके जरिए सामाजिक परिवर्तन का इतिहास पता चलता है. कार्यक्रम में आईटीवी के अध्यक्ष करन थापर, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार भी मौजूद थे. करन थापर ने मीडिया के मौजूदा स्वरूप पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा, "आज मीडिया में टीआरपी हावी है. एक ही कार्यक्रमों या खबरों को बार-बार दिखाया जाता है. ऐसा लगता है जैसे देश-दुनिया में इसके अलावा कोई चर्चा का विषय है ही नहीं." थापर ने भाषा की गुणवत्ता में गिरावट आने की भी बात कही. उन्होंने अरविंद की पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें समाचार पत्रों का जिस प्रकार विश्लेषण किया गया है, उसी तरह आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी विश्लेषण होना चाहिए.  कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि अरविंद ने अपनी पुस्तक के जरिए हिंदी पत्रकारिता के कलेवर को मापने की कोशिश की है. भूमंडलीकरण की छाया कैसे संपादकों पर पड़ती है, यह पुस्तक इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन है. इसके साथ-साथ थानवी ने भाषा के हो रहे पतन और खबरों से विलुप्त हो रही संवेदना पर भी चिंता व्यक्त की. इस दौरान रवीश कुमार ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन मोहल्ल लाइव के अविनाश कर रहे थे.  

(प्रथम प्रवक्ता, 16-30 जून 2013, समाचार-विचार पाक्षिक)

Thursday, 9 May 2013

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले



हमारे पाठक अपमार्केटहैंज्यादातर उच्च वर्गीय या मध्यवर्गीय या बहुत हुआ तो निम्न मध्यवर्गीय। जहां तक विज्ञापन से होने वाली आय की बात है, तो हमारा शेयर बाजार में बहुत ही ज्यादा है, और हमारा विकास अन्य के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से हो रहा है।
अमन नायर, नवभारत टाइम्स, दिल्ली के ब्रांड मैनेजर
पूंजीवादी व्यापार के तौर-तरीकों और लाभ की प्रवृत्ति भूमंडलीकरण के बाद हिंदी अखबारों में तेजी से फैली है। विज्ञापनों पर अखबारों की निर्भरता बढ़ी है, फलतः उनकी नीतियों में बदलाव आया है। वर्तमान में विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की मुहिम में हिंदी के अखबार खबरऔर मनोरंजनके बीच फर्क नहीं करते हैं। ऐसा नहीं कि 80 के दशक में हिंदी अखबारों में खेल या मनोरंजन की खबरें नहीं छपती थीं या उनके लिए अलग से पृष्ठ नहीं होता था। लेकिन वर्ष 1986 में खेल, विशेषकर क्रिकेट की खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बमुश्किल बना करती थीं। वर्तमान में क्रिकेट की खबरें धड़ल्ले से सुर्खियां बनायी जा रही हैं क्योंकि क्रिकेट के खेल में मनोरंजन के साथ-साथ ग्लैमर और काफी धन है। उदारीकरण के बाद बढ़ी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते हिंदी के अखबार पाठकों को हल्की-फुल्की, मनोरंजन जगत की ज्यादा खबरों को देकर उनकी जिज्ञासाएंशांत कर रहे हैं। खबरों का मतलब आज ऐसी खबर है, जो सबेरे-सबेरे लोगों को आहत करने वाली या परेशान करने वाली न हों, यानी खुशखबरी। जाहिर है ऐसे में अखबारों में खबरों की परिभाषा बदल गयी है। इसलिए हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री रानी मुखर्जी या अभिनेता अमिताभ बच्चन या क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर के जीवन से जुड़ी हुई खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बनती हैं और देश में कर्ज से मरने वाले किसान या उत्पीड़न के शिकार दलित-आदिवासी कभी-कभार ही पहले पन्ने पर जगह पाते हैं। आम तौर पर पहले किसी भी दिन घटने वाली घटनाओं की सुर्खियां पहले पन्नों पर सभी अखबारों में एक सी रहती थीं, वर्तमान में यह बात लागू नहीं होती।

वर्ष 1986 में ही नवभारत टाइम्स ने इस बात को नोट किया था, “आज के पाठकों की रुचि व्यापार-वाणिज्य की खबरों में बढ़ने लगी है। वे जानना चाहते हैं कि शेयरों का हिसाब-किताब क्या चल रहा है और चीजों की कीमत किस तरह घट-बढ़ रही है। पूरे देश की मंडियों और व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी एकत्र करने के बाद हम प्रस्तुत कर रहे है अर्थसार।

स्पष्टतः 1986 में अखबार मे शुरू किया गया अर्थसारजो अंदर के पृष्ठ पर थोड़ी सी जगह में सिमटा पड़ा था, वह अब फैलते हुए पहले पन्ने की सुर्खियों मे छाने लगा है।

भूमंडलीकरण का केंद्रीय घटक अर्थतंत्र होने के कारण व्यापार जगत की खबरों, व्‍यावसायिक प्रतिष्ठानों के कलहोंके साथ, शेयर बाजार की उतार-चढ़ाव की खबरें, बाजार भाव आदि की खबरों को अखबार अपने पाठकों को प्रमुखता से परोस रहे हैं। जिसका विस्तृत विश्लेषण हम आगेअर्थतंत्रसे संबंधित सामग्री विश्लेषण के प्रसंग में करेंगे। इसी तरहखेलसे संबंधित सामग्री विश्लेषण के प्रसंग में हम क्रिकेट से संबंधित खबरों को अन्य खेलों के मुकाबले तरजीह देने और भूमंडलीकरण के दौर मेंक्रिकेटीय राष्ट्रवादके प्रसार और उसके कारणों की भी विस्तृत चर्चा करेंगे।

ठीक इसी तरह सवाल यह भी है कि भूमंडलीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय खबरों की जगह पहले पन्ने पर स्थानीय खबरें क्यों ज्यादा छपने लगी हैं? असल में, खबरों के चयन में किसी घटना के साथ लक्षित पाठक वर्ग का जुड़ाव काफी मायने रखता है। यदि कोई घटना ऐसी है, जो पाठकों की देश-दुनिया से जुड़ी हुई है, तो वह अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुकाबले उसे ज्यादा आकर्षित करती है। मीडिया विशेषज्ञ विलबर श्रराम (1973 : 110-111) ने लिखा है कि पूरी दुनिया में जो लोग अखबार जगत से जुड़े हुए हैं, वे जानते है कि स्थानीय खबरें अखबारों की बिक्री को बढ़ाती है।[1] लेकिन भारतीय अखबारों में स्थानीय खबरों को ज्यादा तरजीह नहीं दिया जाता था और उसके बदले अंतरराष्ट्रीय खबरों को प्रमुखता दी जाती थी। बहुत से भारतीय संपादक और कुछ मालिक मानते थे कि स्थानीय खबरों के छापना गंभीर किस्म की पत्रकारिता के खिलाफ है।[2] ऐसा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय खबरें नवभारत टाइम्स में नहीं छपती हैं। अंदर के पन्नों पर अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए देश-विदेश शीर्षक से पन्ना विशेष तौर पर निर्धारित है। लेकिन चूंकि स्थानीय खबरों के पाठक किसी भी समय में अंतरराष्ट्रीय खबरों से ज्यादा होते हैं, अखबारों का जोर स्थानीय खबरों पर बढ़ा है। प्रसंगवश यहां पर नोट करना उचित होगा कि हिंदी अखबारों में अंतरराष्ट्रीय खबरों का चयन और विश्लेषण अमूमन भारतीय राज्य और सत्ता के नजरिए से ही होता आया है। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के मामले में यह ज्यादा सच है।

90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए। जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया। साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई। हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है। साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है। इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। मीडिया विशेषज्ञ सेवंती निनान (2007 : 26) ने इसे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कारकहा है। वे लिखती हैं, “प्रिंट मीडिया ने स्थानीय घटनाओं के कवरेज द्वारा जिला स्तर पर हिंदी की मौजूद सार्वजनिक दुनिया का विस्तार किया है और साथ ही अखबारों के स्थानीय संस्करणों के द्वारा अनजाने में इसका पुनर्विष्कार किया है।”[3] निस्संदेह दूर-दराज के क्षेत्रों से अखबारों का प्रकाशन समाज में हाशिये पर रहने वाले दलित और पिछड़े तबकों के लिए सत्ता में हिस्सेदारी का एक माध्यम बन कर उभरा है। इसी दौरान हिंदी क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए और सत्ता में सदियों से वंचित तबकों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। पर इन बदलावों को पूंजीवाद जनित देशज आधुनिकता (vernacular modernity) के प्रिज्म से विश्लेषित करना (नियाजी : 2010) [4] दूर की कौड़ी लाना है। भूमंडलीकरण के साथ-साथ समाचार पत्र क्रांतिके मार्फत उभरी इस देशज आधुनिकताकी पहली शर्त यदि आलोचना और स्वातंत्र्य चिंतन है, तो फिर इस पुनर्विष्कृत सावर्जनिक दुनिया में हम विरले ही भूमंडलीकरण या उसके द्वारा लाए गए अवारा पूंजी की आलोचना देखते हैं। साथ ही भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक पेड न्यूज़की देशी परिघटनाको इस आधुनिकता के साथ जोड़ कर देखना रोचक होगा! मीडिया विमर्श के इन पश्चिमी मॉडलों के सहारे हम न ही देशज आधुनिकता के सिद्धांत को बहुत दूर तक लागू कर सकते हैं और न ही समाचार पत्र क्रांति के पीछे छिपी राजनीति को विश्लेषित कर सकते हैं, जिसने हिंदी अखबारों को अराजनीतिक बनाया है।
(हिंदी में समाचार से एक अंश, साभार मोहल्ला लाइव)

[1] विलबर श्रराम (1973), “मैन, मैसेजेस एंड मीडिया : ए लुक एट ह्यूमन कम्यूनिकेशन”, न्यूयार्क : हार्पर एंड रो
[2] रॉबिन जैफ्री (2000), “इंडियाज न्यूज़पेपर रिवोल्यूशन”, दिल्ली : ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[3] सेंवती निनान (2007), “हेडलाइन फ्राम द हार्टलैंड : रिइनवेंटिंग द हिंदी पब्लिक स्फ़ियर”, नयी दिल्ली : सेज पब्लिकेशंस
[4] तबरेज अहमद नियाजी (2010), ‘कल्चरल इंपिरियलिज्म आर वर्नाक्यूलर मॉडर्निटी? हिंदी न्यूजपेपर्पस इन ए ग्लोबलाइजिंग इंडिया, मीडिया कल्चर सोसाइटी, सेज पब्लिकेशन, अंक 32 (6), पेज नंबर 907-925