Sunday, 12 May 2013

मूल्यों की चिंता जरूर करें पत्रकार: तलवार

नई दिल्ली, 11 मई. (जनसत्ता ब्यूरो) वरिष्ठ आलोचक वीरभारत तलवार ने हिंदी पत्रकारिता से साहित्यकारों के जुड़े रहने की परंपरा का जिक्र करते हुए शनिवार को यहाँ कहा कि पत्रकार साहित्यिक हो या गैर साहित्यिक लेकिन उसे प्रोफेशनलहोना चाहिए और मूल्यों की चिंता जरूर की जानी चाहिए. 

यह बात उन्होंने यहाँ अरविंद दास की पुस्तक हिंदी में समाचारके लोकार्पण के असर पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में कही. तलवार ने इस पुस्तक को हिंदी पत्रकारिता के बदलाव की किताब बताते हुए कहा कि इस इस बदलाव की कहानी इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती, अगर पुस्तक में मूल्यों में बदलाव की चिंता न की गई होती. उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में भूमंडलीकरण के दौर के अंतरविरोधों का गहराई से विश्लेषण किया गया है. उन्होंने कहा कि पुस्तक में धर्म और बाजार के गठजोड़ पर जो दृष्टि गई है वह पत्रकारिता के इतिहास को समाज परिवर्तन का इतिहास भी बना देती है.

आइ टीवी के अध्यक्ष करन थापर ने इस अवसर पर भाषा के स्वभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि अखबार की भाषा औपचारिक भाषा है जबकि आपके ड्राइंग रूम में मौजूद टेलीविजन हर उस चीज से होड़ कर रहा है जो आप कर रहे हैं. टीवी उसी भाषा में होना चाहिए जिसमें आप बात करते हैं. टीवी अगर आम आदमी की भाषा की जगह औपचारिक भाषा में होगा तो वह एकदम नकली हो जाएगा. उन्होंने खबरिया चैनलों पर होने वाली अटकलबाजियों का जिक्र करते हुए शुक्रवार को दो मंत्रियों (पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार) के इस्तीफों पर चली अटकलबाजी का जिक्र किया, जो, उन्होंने कहा कि पाँच घंटे चली. थापर ने कहा कि अगर इसकी जगह बीबीसी होता तो पांच घंटे अटकलों में नहीं लगाए जाते. वहां विश्वनीयता का ध्यान रखा जाता है.

उन्होंने कहा कि टीवी चैनलों की बहसें भी तमाशा खड़ा करने और झगड़ा करने वाली होती है. टीवी चैनल दरअसल, टीआरपी की दौड़ में लगे हैं. उन्होंने कहा कि बीबीसी स्वायत्त है. वह विज्ञापन के लिए नहीं भागता. थापर ने कहा कि अगर आप न्यूज वैल्यूसे अलग होते हैं तो आपकी गुणवत्ता पर असर पड़ता है और यह पत्रकारिता नहीं है. 

एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार ने अस्सी और नब्बे के दशकी की हिंदी पत्रकारिता का जिक्र करते हुए बताया कि उस दौर में अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही थी लेकिन इसके बावजूद हम उतने प्रभावी नहीं थे. सत्ता पर (अंग्रेजी अखबारों की तुलना में) असर करने में हम पीछे रह जाते हैं. अस्सी और नब्बे का दशक भी हमारे लिए स्वर्ण युग नहीं था और आज का दौर भी नहीं है. हम हिंदी में पत्रकारीय संवेदन नहीं बल्कि मनोरंजन में तब्दील हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि अस्सी के दशक में राजनीतिक पत्रकारिता होती थी और आज हम अगर मनोरंजन या व्यापार की तरफ जाते हैं तो इसे देखा जाना चाहिए.

रवीश ने टीवी में भी भाषा का ध्यान रखे जाने पर सहमति जताते हुए कहा कि भाषा के साथ-साथ हमने उसका भाव भी मारा है. इन चीजों को हम समाप्त करने देंगे तो कैसी स्थिति बनेगी, इस पर सोचना होगा. इस मौके पर जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने भी अपने विचार रखे. पुस्तक के लेखक अरविंद दास ने इस अवसर पर कहा कि भूमंडलीकरण के बाद भारतीय समाज और राजनीति में जो परिवर्तन आए, वे मीडिया और खास तौर पर भाषाई मीडिया में भी आए. इस पुस्तक में उस परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित किया गया है. यह एक तरह से मेरा शोध कार्य है. शुरुआत में कार्यक्रम का संचालन कर रहे मोहल्ला लाइव अविनाश  ने कहा कि इस किताब में पहली चिंता भाषा की है और इसमें बहुसंख्यक जनता को केंद्र में रखा गया है.

 (जनसत्ता से साभार)

Thursday, 9 May 2013

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले



हमारे पाठक अपमार्केटहैंज्यादातर उच्च वर्गीय या मध्यवर्गीय या बहुत हुआ तो निम्न मध्यवर्गीय। जहां तक विज्ञापन से होने वाली आय की बात है, तो हमारा शेयर बाजार में बहुत ही ज्यादा है, और हमारा विकास अन्य के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से हो रहा है।
अमन नायर, नवभारत टाइम्स, दिल्ली के ब्रांड मैनेजर
पूंजीवादी व्यापार के तौर-तरीकों और लाभ की प्रवृत्ति भूमंडलीकरण के बाद हिंदी अखबारों में तेजी से फैली है। विज्ञापनों पर अखबारों की निर्भरता बढ़ी है, फलतः उनकी नीतियों में बदलाव आया है। वर्तमान में विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की मुहिम में हिंदी के अखबार खबरऔर मनोरंजनके बीच फर्क नहीं करते हैं। ऐसा नहीं कि 80 के दशक में हिंदी अखबारों में खेल या मनोरंजन की खबरें नहीं छपती थीं या उनके लिए अलग से पृष्ठ नहीं होता था। लेकिन वर्ष 1986 में खेल, विशेषकर क्रिकेट की खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बमुश्किल बना करती थीं। वर्तमान में क्रिकेट की खबरें धड़ल्ले से सुर्खियां बनायी जा रही हैं क्योंकि क्रिकेट के खेल में मनोरंजन के साथ-साथ ग्लैमर और काफी धन है। उदारीकरण के बाद बढ़ी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते हिंदी के अखबार पाठकों को हल्की-फुल्की, मनोरंजन जगत की ज्यादा खबरों को देकर उनकी जिज्ञासाएंशांत कर रहे हैं। खबरों का मतलब आज ऐसी खबर है, जो सबेरे-सबेरे लोगों को आहत करने वाली या परेशान करने वाली न हों, यानी खुशखबरी। जाहिर है ऐसे में अखबारों में खबरों की परिभाषा बदल गयी है। इसलिए हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री रानी मुखर्जी या अभिनेता अमिताभ बच्चन या क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर के जीवन से जुड़ी हुई खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बनती हैं और देश में कर्ज से मरने वाले किसान या उत्पीड़न के शिकार दलित-आदिवासी कभी-कभार ही पहले पन्ने पर जगह पाते हैं। आम तौर पर पहले किसी भी दिन घटने वाली घटनाओं की सुर्खियां पहले पन्नों पर सभी अखबारों में एक सी रहती थीं, वर्तमान में यह बात लागू नहीं होती।

वर्ष 1986 में ही नवभारत टाइम्स ने इस बात को नोट किया था, “आज के पाठकों की रुचि व्यापार-वाणिज्य की खबरों में बढ़ने लगी है। वे जानना चाहते हैं कि शेयरों का हिसाब-किताब क्या चल रहा है और चीजों की कीमत किस तरह घट-बढ़ रही है। पूरे देश की मंडियों और व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी एकत्र करने के बाद हम प्रस्तुत कर रहे है अर्थसार।

स्पष्टतः 1986 में अखबार मे शुरू किया गया अर्थसारजो अंदर के पृष्ठ पर थोड़ी सी जगह में सिमटा पड़ा था, वह अब फैलते हुए पहले पन्ने की सुर्खियों मे छाने लगा है।

भूमंडलीकरण का केंद्रीय घटक अर्थतंत्र होने के कारण व्यापार जगत की खबरों, व्‍यावसायिक प्रतिष्ठानों के कलहोंके साथ, शेयर बाजार की उतार-चढ़ाव की खबरें, बाजार भाव आदि की खबरों को अखबार अपने पाठकों को प्रमुखता से परोस रहे हैं। जिसका विस्तृत विश्लेषण हम आगेअर्थतंत्रसे संबंधित सामग्री विश्लेषण के प्रसंग में करेंगे। इसी तरहखेलसे संबंधित सामग्री विश्लेषण के प्रसंग में हम क्रिकेट से संबंधित खबरों को अन्य खेलों के मुकाबले तरजीह देने और भूमंडलीकरण के दौर मेंक्रिकेटीय राष्ट्रवादके प्रसार और उसके कारणों की भी विस्तृत चर्चा करेंगे।

ठीक इसी तरह सवाल यह भी है कि भूमंडलीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय खबरों की जगह पहले पन्ने पर स्थानीय खबरें क्यों ज्यादा छपने लगी हैं? असल में, खबरों के चयन में किसी घटना के साथ लक्षित पाठक वर्ग का जुड़ाव काफी मायने रखता है। यदि कोई घटना ऐसी है, जो पाठकों की देश-दुनिया से जुड़ी हुई है, तो वह अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुकाबले उसे ज्यादा आकर्षित करती है। मीडिया विशेषज्ञ विलबर श्रराम (1973 : 110-111) ने लिखा है कि पूरी दुनिया में जो लोग अखबार जगत से जुड़े हुए हैं, वे जानते है कि स्थानीय खबरें अखबारों की बिक्री को बढ़ाती है।[1] लेकिन भारतीय अखबारों में स्थानीय खबरों को ज्यादा तरजीह नहीं दिया जाता था और उसके बदले अंतरराष्ट्रीय खबरों को प्रमुखता दी जाती थी। बहुत से भारतीय संपादक और कुछ मालिक मानते थे कि स्थानीय खबरों के छापना गंभीर किस्म की पत्रकारिता के खिलाफ है।[2] ऐसा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय खबरें नवभारत टाइम्स में नहीं छपती हैं। अंदर के पन्नों पर अंतरराष्ट्रीय खबरों के लिए देश-विदेश शीर्षक से पन्ना विशेष तौर पर निर्धारित है। लेकिन चूंकि स्थानीय खबरों के पाठक किसी भी समय में अंतरराष्ट्रीय खबरों से ज्यादा होते हैं, अखबारों का जोर स्थानीय खबरों पर बढ़ा है। प्रसंगवश यहां पर नोट करना उचित होगा कि हिंदी अखबारों में अंतरराष्ट्रीय खबरों का चयन और विश्लेषण अमूमन भारतीय राज्य और सत्ता के नजरिए से ही होता आया है। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के मामले में यह ज्यादा सच है।

90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए। जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया। साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई। हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है। साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है। इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। मीडिया विशेषज्ञ सेवंती निनान (2007 : 26) ने इसे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कारकहा है। वे लिखती हैं, “प्रिंट मीडिया ने स्थानीय घटनाओं के कवरेज द्वारा जिला स्तर पर हिंदी की मौजूद सार्वजनिक दुनिया का विस्तार किया है और साथ ही अखबारों के स्थानीय संस्करणों के द्वारा अनजाने में इसका पुनर्विष्कार किया है।”[3] निस्संदेह दूर-दराज के क्षेत्रों से अखबारों का प्रकाशन समाज में हाशिये पर रहने वाले दलित और पिछड़े तबकों के लिए सत्ता में हिस्सेदारी का एक माध्यम बन कर उभरा है। इसी दौरान हिंदी क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए और सत्ता में सदियों से वंचित तबकों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। पर इन बदलावों को पूंजीवाद जनित देशज आधुनिकता (vernacular modernity) के प्रिज्म से विश्लेषित करना (नियाजी : 2010) [4] दूर की कौड़ी लाना है। भूमंडलीकरण के साथ-साथ समाचार पत्र क्रांतिके मार्फत उभरी इस देशज आधुनिकताकी पहली शर्त यदि आलोचना और स्वातंत्र्य चिंतन है, तो फिर इस पुनर्विष्कृत सावर्जनिक दुनिया में हम विरले ही भूमंडलीकरण या उसके द्वारा लाए गए अवारा पूंजी की आलोचना देखते हैं। साथ ही भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक पेड न्यूज़की देशी परिघटनाको इस आधुनिकता के साथ जोड़ कर देखना रोचक होगा! मीडिया विमर्श के इन पश्चिमी मॉडलों के सहारे हम न ही देशज आधुनिकता के सिद्धांत को बहुत दूर तक लागू कर सकते हैं और न ही समाचार पत्र क्रांति के पीछे छिपी राजनीति को विश्लेषित कर सकते हैं, जिसने हिंदी अखबारों को अराजनीतिक बनाया है।
(हिंदी में समाचार से एक अंश, साभार मोहल्ला लाइव)

[1] विलबर श्रराम (1973), “मैन, मैसेजेस एंड मीडिया : ए लुक एट ह्यूमन कम्यूनिकेशन”, न्यूयार्क : हार्पर एंड रो
[2] रॉबिन जैफ्री (2000), “इंडियाज न्यूज़पेपर रिवोल्यूशन”, दिल्ली : ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[3] सेंवती निनान (2007), “हेडलाइन फ्राम द हार्टलैंड : रिइनवेंटिंग द हिंदी पब्लिक स्फ़ियर”, नयी दिल्ली : सेज पब्लिकेशंस
[4] तबरेज अहमद नियाजी (2010), ‘कल्चरल इंपिरियलिज्म आर वर्नाक्यूलर मॉडर्निटी? हिंदी न्यूजपेपर्पस इन ए ग्लोबलाइजिंग इंडिया, मीडिया कल्चर सोसाइटी, सेज पब्लिकेशन, अंक 32 (6), पेज नंबर 907-925

Thursday, 2 May 2013

Hindi Mein Samachar: launch and Discussion

'Hindi Mein Samachar' from Antika Prakashan is slated to be released, followed by a panel discussion, on Saturday, 11th May at 5:30 at India International Centre, Seminar Hall number 3. Panelists include- Prof. Vir Bharat Talwar (JNU), Karan Thapar (President, ITV), Om Thanvi (Editor, Jansatta), Ravish Kumar  (Executive Editor, NDTV India) and Avinash (Moderator, Mohalla Live).You are cordially invited to celebrate the launch of my book.

Thursday, 25 April 2013

हिन्दी में समाचार: बरास्ते कस्बा

रवीश कुमार: हिंदी में समाचार अंतिका प्रकाशन से आई नई किताब का नाम है जिसे लिखा है जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी और पत्रकार अरविंद दास ने । हिन्दी में मीडिया पर लिखने वाले लेखकों को मैं(वैसे मैं हूं ही कौन लेकिन फिर भी) दो श्रेणी में बांटता हूं। पहला कामचोर लेखकों की जमात जो किसी का इंटरव्यू,स्क्रिप्ट और कतरनों को लेकर मीडिया और सरोकार,एंकरिंग और रिपोर्टिंग कैसे करें टाइप के शीर्षकों से किताब लिख मारता है। कोर्स में लगवा कर मीडिया की फूफागिरी प्राप्त कर लेता है। दूसरी जमात में वे लेखक हैं जो परिश्रम और टेक्निक से किताबें लिख रहे हैं। गंभीरता के साथ अपने निष्कर्षों को आलोचना और सराहना के लिए पेश कर रहे हैं। विनित, मिहिर और अब अरविंद दास की किताब है। हाल ही में एक और किताब आई है अभय और पंकज की दर दर गंगे जिसमें हिन्दी जगत टाइप की सड़ांध से निकल कर ज्ञानोत्पादन करने का प्रयास दिखता है। यह एक अच्छा संकेत हैं। आज इनकी किताबों में भले कमियां हो लेकिन आने वाले समय में ये अगर इसी तरह से लिखते रहे तो हिन्दी में कुछ ठोस कर पायेंगे । आप अरविंद दास की इस नई किताब को पढ़ते हुए कम से कम इस संतोष से गुज़रते हैं कि कुछ पता चल रहा है। बीते दशकों में हिन्दी पत्रकारिता के एक बड़े अखबार नवभारत टाइम्स के बहाने दिखा रहे हैं कि कैसे चीज़ें बदल रही हैं। राबिन जेफ्री ने दिखाया है कि कैसे भाषाई अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है अरविंद इस विषय को नवभारत टाइम्स के सैंपल से देख रहे हैं यह समझने के लिए कि प्रसार के बीच सामग्री कटेंट में क्या बदलाव आ रहा है।

कम शब्दों और तमाम उद्धरणों के सहारे भूमंडलीकरण की एक संक्षिप्त समझ पेश करते हुए अरविंद अपने मूल विषय पर आ जाते हैं कि इसका प्रभाव नवभारत टाइम्स की खबरों के चयन, प्राथमिकता,भाषा और प्रस्तुति वगैरह पर क्या पड़ा। अव्वल तो अरविंद की निगाह से एक बात रह गई कि इन बदलावों में शामिल नवभारत टाइम्स के पत्रकारों की भूमंडलीयता क्या थी। मतलब उनका आउटलुक और चिन्तन जगत से है।  वे समाज के किस तबके से आकर बिना विदेश गए(धारणाधारित) कैसे एक ही साथ लोकल और ग्लोबल हो रहे थे। सुधीश पचौरी का संदर्भ है जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दी के अखबारों में एक साथ लोकल और ग्लोबल सूचनाओं का आधिक्य बढ़ा है। वे सूचनाएं क्या हैं। हैरतअंगेज़ खबरों की ग्लोबल सूचनाएं या वेनेज़ुएला में आए बदलाव की विस्तृत समझ वाली सूचनाएं मुझे नहीं मालूम। फिर भी झांसी से आया कोई पत्रकार डेस्क पर एजेंसी और गार्डियन टाइम्स और बीच बीच में बीबीसी हिन्दी सेवा की साइट देखकर झटाक से ग्लोबल खबरों को ऐसे लिखने लगता है जैसे औरैया या मेरठ की घटनाओं पर लिख रहा हो यह कम बड़ी बात नहीं है। ग्लोबल जगत में गए बिना हम ग्लोबल हो सकते हैं। यही एक समस्या है आप किताब की समीक्षा लिखने बैठते हैं और अपनी बात और सवालों में भटक जाते हैं। शायद अच्छी किताब का यही काम होता होगा। 

खैर हिन्दी के समाचार ग्लोबल और लोकल हो गए। मनोरंजन की खबरों की प्रमुखता बढ़ी बल्कि खबरें मनोरंजन की शैली में लिखी जाने लगी। अरविंद के सामने अस्सी के दशक के अखबार हैं और इक्कीसवीं सदी के कुछ साल के अखबार हैं। वे अपने सैंपल के बारे में ईमानदारी से बता देते हैं और कह देते हैं कि इसी सीमा के तहत मैं इन बदलावों को देख रहा हूं। उनकी एक पंक्ति पर मेरी निगाह बार बार टिकती रही कि अस्सी के दशक में हिन्दी के जो अखबार निस्तेज थे वे भूमंडलीय संचार तकनीक विशेष रूप से कंप्यूटर के इस्तमेमाल की वजह से वर्तमान में सर्वांग सुन्दर हैं। निस्तेज। क्या इस लेखक ने सिर्फ साज सज्जा के आधार पर लिखा होगा। प्रसार संख्या और सर्वांग सुन्दरता हासिल होने के बाद क्या प्रभाव में भी हिन्दी के अखबारों का निस्तेज तेज में बदला है। इस पर आप लोग टिप्पणी करें तो अच्छा होगा। हिन्दी के अखबारों का असर है कि नहीं। है तो कहां है और नहीं है तो कहां कहां नहीं हैं।

भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अखबार अब राजनीति को आधुनिक मानव की नियति और नियंता नहीं मानते हैं। महानगरों में अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व ज्यादा हावी है। दूसरे शब्दों में अखबार यथास्थिति को बरकरार रखने में राज्य और सत्ता के सहयोगी हैं यह अरविंद के शब्द हैं जिनका एक निष्कर्ष है कि १९८६ में राजनीतिक खबरों का महत्व था जो २००५ तक आते आते राजनीति से ज्यादा अर्थतंत्र और खेल की खबरों को तरजीह दी जाने लगी। अरविंद ने साफ किया है कि उन्होंने अपने सैंपल में उन घटनाओं को शामिल नहीं किया है जिनके कारण लोग ज्यादा खबरें पढ़ने लगते हैं जैसे बाबरी मस्जिद का ध्वंस या किसी प्रधानमंत्री का इस्तीफा वगैरह। वे सामान्य काल को अपना आधार बनाकर लिख रहे हैं। 
अब अरविंद भी उसी दिक्कत में फंसते हैं जिससे निकलने के लिए वे राबिन जेफ्री की सीमाओं को चिन्हित करते हैं। सुर्खियों के सैंपल से कंटेंट का सैंपल नहीं मिलता। किस तरह की राजनीतिक खबरें छपा करती थीं और अब जो छप रही हैं उसकी भाषा और तेवर कैसे हैं। अस्सी के दशक का राजनीतिक उथल पुथल और २००५ के आस पास का राजनीतिक दौर अलग है। अब राजनीति खासकर दिल्ली की राजनीति आर्थिक नीतियों से चल रही है। इसलिए लेखक को आगे चलकर आर्थिक खबरों के राजनीतिक टोन को भी देखना चाहिए। नब्बे के दशक के बाद राजनीतिक अस्थिरता कम हुई है। चुन कर आने वाली सरकारों का प्रतिशत बढ़ा है। प्रसार संख्या के साथ साथ वोटों का प्रतिशत बढ़ रहा है। विकास एक मंत्र की तरह पेश किया जाने लगा है। 

क्या इस लिहाज़ से राजनीतिक चेतना या लोकतंत्र में अखबारों की भूमिका को देखा जाना चाहिए था? मुझे नहीं मालूम, मैं सिर्फ अरविंद के दिलचस्प निष्कर्ष के साथ अपना एक सवाल जोड़ रहा हूं जिसमें वे कहते हैं कि आधुनिक लोकतंत्र में अखबार राजनीतिक खबरों को नियंता नहीं मानते हैं। आर्थिक चेतना,उपभोग के सवाल राजनीति के मुद्दे बनते हैं। कब टीवी सस्ता करना है और बाइक के दाम बढ़ाने हैं ये भले ही आर्थिक और उपभोग के फैसले लगें लेकिन इनके पीछे राजनीतिक चालें भी होती होंगी। मध्यमवर्ग को लुभाने वाली खबरों के तहत ऐसी सूचनाएं अपना काम करती होगीं। क्योंकि लेखक खुद पेज ७८ पर ज्यां ब्रौद्रिला से सहमत होते कहते हैं कि मध्य वर्ग की लालसा की पूर्ति के लिए कि हिन्दी अखबारों के सहारे ही भूमंडलीकरण ने हिन्दी प्रदेश के महानगरों,कस्बों और गावों में अपना पांव फैलाया है। तो भूमंडलीकरण ने मीडिया के ज़रिये अपना पांव फैलाया या इस क्रम में मीडिया को भी फैला दिया। यह निष्कर्ष कुरेदता है। हिन्दी प्रदेश के महानगर? दिल्ली या मुंबई या लखनऊ? महानगरों का स्पेस जो चलाता है वो किस प्रदेश से आता है हिन्दी से या अंग्रेजी से। नवभारत टाइम्स अंग्रेजी की नकल में चल रहा है या अपने रास्ते किसी स्वतंत्र चेतना का निर्माण कर रहा है। क्या यह सही नहीं है कि हिन्दी प्रदेशों से चुन कर आए दलों के गठबंधन से बनी और टिकी सरकारों के आर्थिक फैसलों से भूमंडलीकरण आया और उन्हीं से फैला जब मुलायम मायावती नीतीश नरेंद्र मोदी शिवराज सिंह चौहान और रमण सिंह जैसे अंग्रेजी न बोलने वाले नेताओं ने विकास और जीडीपी को राजनीतिक स्लोगन में बदला या किन्ही और कारकों से।

मैंने कोई अस्सी पन्ने पढ़े हैं। चूंकि लेखक ने ही कहा है कि मेरी किताब की बखिया उधेड़ दीजिए लेकिन किताब बखिया उधेड़ने वाली नहीं है। मैंने समीक्षा कम अपने उन सवालों को ज्यादा जोड़ दिया है जिसका जवाब मैं ढूंढ रह हूं। कुछ तो इम्प्रैस करूंगा न भाई। यहां तो कितने लिलपड़ाक भाव भंगिमा धर कर हिन्दी जगत के विचारक बने घूम रहे हैं। मैं काहे अलग रहूं किसी से। तो मित्रों यह किताब हिन्दी पत्रकारिता में दिलचस्पी रखने वालों के इसलिए काम आएगी क्योंकि लेखक ने गट फीलिंग के आधार पर लिखने से बचने का प्रयास किया है। मुझे पसंद आई है और पढ़ते वक्त मेरा टाइम खराब नहीं हुआ है। अरविंद को एक सलाह है। जब किताब लिखें तो किसी का भी अलग से इंटरव्यू न छापें। उसे किताब का ही हिस्सा बनायें। इसी शनिवार शाम को आई आई सी में इसका लोकार्पण करण थापर कर रहे हैं। 

Blog link: http://naisadak.blogspot.in/ (रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा से साभार)

(किताब का लोकार्पण आईआईसी, दिल्ली में शनिवार 11 मई को होना है)

Saturday, 6 April 2013

हिंदी में समाचार


अंतिका प्रकाशन, सजिल्द, मूल्य: 390 रुपए
ISBN Number: 9789381923573 

किताब के बारे में  
भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं हिंदी अखबार जो अंग्रेजी अखबारों के पिछलग्गू बने हुए थे, अपनी निजी पहचान लेकर सामने आए संचार क्रांति के दौर में इनके व्यावसायिक हितों के फलने-फूलने का खूब मौका मिला और आज येग्लोकल’  हैं
उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज के स्वरूप में आए परिवर्तनों के बरक्स भारतीय मीडिया ने भी खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण, प्रबंधन आदि में परिवर्तन किया हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखेगा कि खबरों के मानी, उसके उत्पादन के ढंग बदल गए हैं अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं भाषा, स्त्री और दलित विमर्श का एक नया रूप उभरा है मिश्रित-अर्थव्यवस्था में जो मध्यवर्गीय इच्छा दबी हुई थी,  वह खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है खबरों के कारोबार मेंपेड न्यूजफाँस नजर आने लगी है हिंदी पत्रकारिता की इन स्थितियों को यह शोधपरक किताब पहली बार सामग्री विश्लेषण और उदाहरणों के जरिये  निरूपित करती है
वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते आए समकालीन भूमंडलीकरण ने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए?  शोध और पत्रकारिता के अपने साझे अनुभव का इस्तेमाल कर अत्यधिक परिश्रम से लेखक ने इसका विवेचन और विश्लेषण किया है
हिंदी में समाचारके मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है

लेखक परिचय:अरविंद दास
जन्म: 1978 में बेलारही, मधुबनी (बिहार) में
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई, आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से हिंदी साहित्य और मीडिया में शोध  भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज  से उर्दू में डिप्लोमा जर्मनी के जिगन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरल शोध पीएचडी के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पोस्ट डॉक्टरल शोध के लिए जर्मन रिसर्च फांउडेशन फेलोशिप
देश-विदेश में मीडिया को लेकर हुए सेमिनारों, वर्कशॉपों में शोध पत्रों की प्रस्तुति भारतीय मीडिया के विभिन्न आयामों को लेकर जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान  इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों के लिए 2012 में 'न्यू मीडिया' को लेकर ट्रेनिंग और कोलंबो में हुए  वर्कशॉप में भागीदारी
पत्रकारिता का ककहरा जनसत्ता से सीखा बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहेअलग अंदाजके ब्लॉगर ब्लॉग लेखों का संकलन-'गुल,नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी' शीघ्र प्रकाश्य मिथिला कला को लेकर एक लघु पुस्तिका- गर्दिश में एक चित्र शैली प्रकाशित
फिलहाल पिछले दो वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी आईटीवी के सीनियर रिसर्चर विशेष तौर पर सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित होने वाले चर्चित कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट' और 'लास्ट वर्ड' के शोध की जिम्मेदारी

 विषयक्रम

                             प्रस्तावना                                                                                               

अध्याय 1
       भूमंडलीकरण की अवधारणा
         भूमंडलीकरण का परिप्रेक्ष्य
        भूमंडलीकरण और पत्रकारिता
अध्याय 2
       अखबार का बदलता स्वरूप: पहला पन्ना
         रूप-रेखा
        सुर्खियाँ एवं उनके विषय 
                                                     भाषाशैली
        विज्ञापन
अध्याय 3
        सामग्री विश्लेषण I
         स्त्री
        धर्म
        अर्थतंत्र
अध्याय 4
        सामग्री विश्लेषण II
         साहित्य
        खेल
अध्याय 5
         सामग्री विश्लेषण III
         किसान एवं मजदूर
         दलित एवं आदिवासी
अध्याय  6
         प्रबंधन एवं संचालन
         प्रबंधन का ढाँचा
        मालिक और संपादक: भूमिका एवं संबंध
        पत्रकारों का चयन एवं नियुक्तियाँ
निष्कर्ष

परिशिष्ट


 (गीता बुक सेंटर और जवाहर बुक सेंटर, जेएनयू में उपलब्ध)

   (अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9868 380797, 98718 56053, अरविंद दास, मोबाइल: 09990 306477)