Friday, 28 February 2014

खबरों की परिभाषा बदली

स्वप्निल सिंह, शोधार्थी, सामााजिक पद्धति अध्ययन संस्थान, जेएनयू: पिछले दो दशकों में भारतीय पत्रकारिता, खास कर भाषाई पत्रकारिता ने जिस तरह से भारतीय समाज को प्रभावित किया है उस रूप में इसे अध्ययन का विषय नहीं बनाया गया. इस लिहाज से हिंदी पत्रकारिता को लेकर हाल ही में अंतिका प्रकाशन से छपी इस शोध आधारित पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए.  

इस पुस्तक में लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता में आए बदलाव और उस पर पड़े प्रभावों का आकलन किया है.  भूमंडलीकरण की विस्तृत व्याख्या के बाद किताब में नवभारत टाइम्स, दिल्ली के अखबार को आधार बना कर सामग्री विश्लेषण की पद्धति से विषय विस्तुओं की पड़ताल की गई है.  भूमंडलीकरण के दौर में पूंजीवाद एक जीवन मूल्य के रूप में स्थापित हो गया है. इसके केंद्र में मुनाफा है. अब खबर एक सूचना ना होकर खुद उत्पाद है, जिसे उपभोक्ता को बेचा जा रहा है. सुर्खियों में अब राजनीति या अंतरराष्ट्रीय समाचार के बदले खेल और कारोबार को ज्यादा स्पेस दिया जा रहा है. स्त्रियों के प्रति हिंसा को भी इस भाषा में प्रस्तुत किया जाता है कि सनसनी पैदा हो. लेखक ने एक जगह नोट किया है- अखबारों के स्त्री विमर्श में जहाँ स्त्रियों के शोषण उत्पीड़न का जिक्र मिलता है वहीं स्त्री के संघर्ष के बारे में एक तरह की चुप्पी है. साथ ही किताब में उदाहरणों के जरिए यह बखूबी दिखाया गया है कि किस तरह स्त्रियों से संबंधित खबरों को पुरुषवादी नजरिए से पाठकों को प्रस्तुत किया जा रहा है. इसकी एक वजह पत्रकारिता की संरचना में स्त्रियों की कम उपस्थिति भी है.

पुस्तक दिखाती है कि किस तरह से भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी आम जनों से कटती जा रही है और बाजार के सुर में सुर मिला कर हिंग्रेजी को अपना रही है. एक तरफ बाजार ने जहाँ हिंदी अखबारों को गाँव-कस्बों तक पहुँचा दिया है वहीं खुद भी वह बाजार के चपेट में आई है.

हिंदी पत्रकारिता के पेज, ले आउट और डिजाइन के क्षेत्र जहां भूमंडलीय तकनीक के बदौलत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं, वहीं विषय वस्तु को लेकर ये बात नहीं कही जा सकती है. हिंदी के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में भी बौद्धिक बहस-मुबाहिसा का स्थान सिकुड़ता चला रहा है. पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में हिंदी पत्रकारिता ने हाशिए के समाज को एक आवाज दी है. जिसे लेखक ने किताब में रेखांकित भी किया है. पर लेखक की चिंता भूमंडलीकरण के दौर में धर्म के बाजारीकरण की भी है. किताब के माध्यम से यह बात सामने आती है कि अखबारों के लिए आस्था का नकदीकरण जैसे एक मजबूरी बन गई है. लेखक ने अखबार को उद्दृत करते हुए लिखा है-हम सब उत्सव प्रेमी हैं. उत्सवधर्मी है हमारा देश. यहाँ हर दिन एक त्योहार है और हर पत्थर एक देवता. पढ़िए इस जीवन, समाज और इसकी आस्था के बारे में हर सोमवार हमारे उत्सव पृष्ठ पर.

पुस्तक में इस अवधारणा की पड़ताल की गई है कि पिछले दो दशकों से किसान, मजदूर, दलित और आदिवासी को लेकर अखबारों का क्या रूख रखा है.  ना तो पहले ये अखबारों के लिए खबर थे ना ही आज. पिछले कुछ सालों में हिंदी अखबारों में दलितों के लेकर जो विमर्श सामने आ रहे हैं जो एक तरह से सर्व व्यापी बाजार के पक्ष में ही है. अपने पत्रकारिता के अनुभव का इस्तेमाल कर लेखक ने किताब में विस्तृत ढंग से इसका विश्लेषण किया गया है. 

हिंदी भले ही सत्ता की भाषा बनके उभरी हो, पर हिंदी पत्रकारिता की पहुँच सत्ता तक उस रूप में नहीं है जिस रूप में अंग्रेजी की है. आने वाले समय में हिंदी अखबार समाज में किस रूप में अपनी पहचान कायम रख पाते हैं यह उसकी विचारधारा और बाजार के संबंध से ही परिभाषित होगा.  पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के साथ-साथ भारतीय राज्य और समाज के साथ मीडिया के संबंधों को लेकर जिज्ञासुओं के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है.

(भारतीय समाजशास्त्र समीक्षा (शोध पत्रिका), जनवरी-मार्च 2014 में प्रकाशित, पेज 144-145)

Saturday, 8 February 2014

संकुचन का समाचार

  प्रांजल धर,  जनसत्ता, 9 फरवरी 2014:  अरविंद दास की पुस्तक हिंदी में समाचार पत्रकारिता के तमाम विचलनों, दबावों और बदलावों का वर्णन-विश्लेषण करती है। इसमें इस बात का नोटिस लिया गया है कि समाज की जिन संस्थाओं पर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है, उनमें से पत्रकारिता भी एक है। जो काम पहले मिशन था, वह बाद में व्यवसाय बना और आज उसकी दशा-दिशा क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। पुस्तक में सामग्री विश्लेषण पर तीन अध्याय हैं जो स्त्री, धर्म, अर्थतंत्र, साहित्य, खेल, किसान, मजदूर और दलित-आदिवासियों के संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों और दशकों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं।

भूमंडलीकरण की वर्तमान अवस्था में उभरे पितृसत्ता के नए रूपों की छवि भी हिंदी अखबारों में दिखाई पड़ती है। हमारी पत्रकारिता में महिलाओं की दशा क्या है, इसका अंदाजा इस पुस्तक से मिलता है। भारत में स्त्री-संघर्ष का इतिहास देश की राजनीतिक, सामाजिक, मजदूर और दलित आंदोलन से संबद्ध रहा और उससे समय-समय पर प्राणवायु हासिल करता रहा है। ऐसे में इस बात की जांच गहराई से किए जाने की दरकार है कि भूमंडलीकरण के बाद अखबारों में किस स्त्री की छवि को परोसा जा रहा है? और क्या स्त्रियों को उतनी आजादी हासिल है, जितनी पुरुषों को, इस सवाल से पत्रकारिता को जूझने की जरूरत है।
पहले जहां अखबार स्त्रियों के संदर्भ में स्वतंत्रता पर, कुटीर उद्योग या फिर महिलाओं की असल समस्याओं पर लिखते थे, वहीं आज सिखाया जाता है किदुल्हन वही जो प्रतियोगिता जीत जाए अपनी पुस्तकहिंदी में समाचारमें अरविंद ऐसी तमाम बुनियादी बातों की तह तक जाते हैं और पिछले काफी समय से चल रहे स्त्री-हिंसा, यौन शोषण या दलित-शोषण का सार्थक जायजा लेते हैं।
पत्रकारिता में प्रबंधकों और संपादकों के आपसी संबंधों के साथ-साथ मालिकों को लेकर भी यह पुस्तक थोड़ा-बहुत विमर्श करती है। समाचार माध्यमों में स्वामित्व की बात करें तो कुछ गंभीर चिंताएं सामने आती हैं। भारतीय समाचार उद्योग के विस्तार और विकास के बावजूद खिलाड़ियों की संख्या सिर्फ घटी, बल्कि एक ओर मीडिया परिदृश्य निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है और दूसरी ओर पब्लिक स्फीयर का क्षेत्रफल भी घट रहा है। इसका असर वैचारिक बहुलता और पाठकों तक पहुंचने वाली खबरों की विविधता पर सीधा पड़ रहा है।
यह छिपी बात नहीं है कि बड़ी पूंजी के जरिए अनेक ऐसे लोग अखबारों और टीवी चैनलों समेत विभिन्न समाचार माध्यमों के मालिक और नियंता बने बैठे हैं, जिन्हें पत्रकारिता के पेशे और उसकी नैतिकता से ज्यादा चिंता इस बात की है कि अपने आप को सुरक्षित कैसे किया जाए। आज ऐसी आशंका जताई जा रही है कि बड़ी पूंजियों के दबाव में छोटे और मंझोले खिलाड़ियों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल होता जाएगा। इसमें किसी आश्चर्य की बात इसलिए नहीं है, क्योंकि पूंजी का चरित्र ही ऐसा होता है, जहां बड़ी पूंजी छोटी पूंजी को निगल जाती है। समाचार माध्यमों के स्वामित्व के संदर्भ में आज भारतीय ही नहीं, पश्चिमी समाचारपत्र जगत में भी ऐसी बहसें बेहद आम हो चली हैं कि क्या अखबारों के स्वामित्व में संकेंद्रण बढ़ रहा है? यह संकेंद्रण विचारों का उपवन कहे जाने वाले पब्लिक स्फीयर और पत्रकारीय प्रतिबद्धता के लिहाज से अच्छा या सराहनीय बिल्कुल नहीं है।
समाचारों के संदर्भ मेंएक्टिव रिपोर्टरनामक अपनी चर्चित किताब में लेविस जेम्स ने जिस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं को अखबारों की आत्मा माना है, उस तरह के कटिबद्ध संवाददाताओं की कमी भी अखरने वाली बात है। असल में यह पेज-थ्री पत्रकारिता का दुष्प्रभाव ही है। वर्तमान समय में उन्हीं हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या ज्यादा है, जो अंग्रेजी में निकलने वाले प्रतिष्ठित अखबारों के सहायक अखबारों के रूप में निकल रहे हैं। इसे हिंदी अखबारों के दुर्भाग्य और अवांछित विकास के तौर पर लिया जाता है। कहा जाता है कि हिंदी अखबार, अंग्रेजी अखबारों के सांचे में ढल कर उनका प्रतिरूप, या प्रकारांतर से पिछलग्गू, बनते जा रहे हैं। ऐसे अनेक कोणों पर अरविंद विचार करते हैं, पर यह विचार-विश्लेषण और भी ज्यादा गहरा हो सकता था।
हालांकि यह पुस्तक अंग्रेजी मीडिया के साथ-साथ प्रसंगवश बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान का भी विश्लेषण करती चलती है, पर सवाल है कि क्या हिंदी की जनता अंग्रेजी कीपब्लिकवाले जीवन मूल्यों और समाचार-मूल्यों को बिना किसी हिचक के स्वीकार कर पाने की स्थिति में चुकी है? यहां आकर पत्रकारीय सरोकारों के सिकुड़ते चले जाने का सवालभारतऔरइंडियाके बीच पसरे विशाल अंतरों से जुड़ जाता है। स्वामित्व के इस संकेंद्रण का ही दुष्प्रभाव है कि इस समयआजजैसा महत्त्वपूर्ण हिंदी अखबार भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
हिंदी भाषा के संदर्भ में उत्तर प्रदेश को भले भारत का हृदयस्थल यानी हार्टलैंड कहा जाता रहा हो, लेकिन यहां भीएनआइपी’, ‘अमृत प्रभात’, ‘आज’, ‘स्वतंत्र भारत’, ‘स्वतंत्र चेतना’, ‘जनवार्ताऔरजनमोर्चाजैसे कई अखबार या तो बंद हो गए या फिर हाशिये पर चले गए हैं। कुछ तो किसी तरह चल रहे हैं, लेकिन उनकी आयु ज्यादा लंबी नहीं है। और फिर बात केवल बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे एक-दो राज्यों की ही नहीं है। राजस्थान की बात करें तो वहां भीनवज्योतिका ग्राफ नीचे जा रहा है और यही हाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मेंनवभारतऔरदेशबंधुका है।
आज के मीडिया विश्लेषण स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी किसी एक या दो बड़े मीडिया समूहों का स्पष्ट प्रभुत्व भले दिखता हो, लेकिन विभिन्न भाषाई क्षेत्रों या राज्यों में एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां साफ देखी जा सकती हैं। भारत में कम से कम छह ऐसे राज्य हैं, जहां एक बड़ी मीडिया कंपनी का बढ़ता दबदबा स्पष्ट रूप से नजर आता है। इन सब मुद्दों पर और भी गंभीर रोशनी डाली जा सकती थी। परिशिष्ट में यह विज्ञापनों पर विमर्श के साथ-साथ प्रभाष जोशी का साक्षात्कार और अनेक वरिष्ठ लोगों से बातचीत भी प्रस्तुत करती है। इसे लिखने के क्रम में लेखक ने खासा क्षेत्रीय कार्य किया है।
हिंदी में समाचार: अरविंद दास; अंतिका प्रकाशन, सी-56/ यूजीएफ-2, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद, उप्र; 390 रुपए।

Saturday, 11 January 2014

ख़बरों की ख़बर

हिंदुस्तान ( 12.01.2014), धर्मेंद्र सुशांत
http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-392181.html

युवा पत्रकार-शोधार्थी अरविंद दास की यह पुस्तक वैश्वीकरण के दौर में उभरे नव पूंजीतंत्र की छाया में विकसित और परिवर्तित हुई हिंदी पत्रकारिता का गहन विवेचन करती है। जिस परिघटना को आज सूचना-संचार क्रांति कहा जाता है, उसके दौर में हिंदी समाचार जगत ने न केवल नई पहचान कायम की, बल्कि अपने व्यावसायिक हितों को भी नए सिरे से बढ़ने-व्यापक होने की दिशा में दूर तक पहुंचाया। इस सफलता के बरअक्स हिंदी मीडिया को दूसरी तरफ ‘पेड न्यूज’ जैसे लांछन का सामना भी करना पड़ा। मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में जहां सियासी और समाजी महत्व की खबरों के बदले मनोरंजन के तत्व हावी होते चले गए, वहीं प्रमुख मीडिया के सरोकार भी स्पष्ट तौर पर बदल गए। दास की यह किताब मीडिया के बहुआयामी बदलाव को सोदाहरण सामने रखती है। पिछले दो दशक का मीडिया जगत इस विवेचना के दायरे में शामिल है।



हिंदी में समाचार, अरविंद दास, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद-5, मूल्य: 390 रु.

Friday, 3 January 2014

आलोचक की पसंद: हिंदी में समाचार



 शुक्रवार, 3 जनवरी, 2014 को 11:47 IST तक के समाचार

हिन्दी का कथेतर गद्य, किताबें 2013

कथेतर हिन्दी गद्य की बारहा आलोचना होती रही है. एक तो औपनिवेशिक शासन से निकले तीसरी दुनिया के एक ऐसे देश की भाषा जिसको लेकर भांति-भांति के रगड़-झगड़ हैं, दूजे कहानी-कविता की तुलना में वैचारिक गद्य पढ़ने वालों की क्षीण संख्या, कथेतर हिन्दी गद्य की दुबली काया इन दोनों चिंताओं से कब उबर पाएगी, पता नहीं.
हिन्दी में उल्लेखनीय कथेतर गद्य आता भी कम है, उसे स्वीकारा और सहेजा भी कम जाता है. बहरहाल, प्रस्तुत है साल 2013 में प्रकाशित हिन्दी की किताबों की तीसरी किस्त, आलोचकों की पसंद.

अपूर्वानंद


अपूर्वानंद, हिन्दी लेखक
अपूर्वानंदः दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर. आलोचना कृति 'सुंदर का स्वप्न' और 'साहित्य का एकांत' प्रकाशित.

मुझसे गुजरे साल में हिंदी की कथेतर पुस्तकों में से एक चयन पेश करने को कहा गया है. ज़ाहिर है, यह मेरा अपना चुनाव है. ये पुस्तकें श्रेष्ठ हैं, यह दावा नहीं क्योंकि श्रेष्ठता का निर्धारण एक या दो साल के भीतर नहीं हो जाया करता. ख़ासकर किताबों के मामले में, जिन्हें अपना असर या छाप छोड़ने के लिए लिए वक़्त की दरकार होती है.
कथेतर कहने के बाद एक पाबंदी और है कि इस चयन में कविता को शामिल नहीं किया जाएगा. फिर भी इसका दायरा बहुत बड़ा ही रहता है. इसके भीतर आलोचना, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, शिक्षा, समाज अध्ययन, राजनीति, आदि जैसी अनेक विधाएँ शामिल हैं.

  • चूड़ी बाजार में लड़की- कृष्ण कुमार, राजकमल प्रकाशन
कृष्ण कुमार की किताब विषय के महत्व के अलावा अपने गद्य के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. चूड़ी के बिना हिन्दुस्तानी लड़की की कल्पना करना कठिन है. चूड़ी पहन कर घर बैठो-जैसी लानत की लोकप्रियता से यह अंदाज भी मिलता है कि दरअसल लड़की का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध कायरता, भीरुता या निकम्मेपन के भावों के साथ हिन्दुस्तानी मन में है. क्या कहना होगा कि यह मन पुरुष मन ही है! कृष्ण कुमार चूड़ी उद्योग के लिए मशहूर फ़िरोज़ाबाद की दस साल पुरानी यात्रा के अपने और अपनी छात्राओं के अनुभवों के आधार पर लड़की के बनने की कथा रचते हैं. एकाध अंश देखिए :
“देह के अलग-अलग अंगों का ... अनुभव इसे इसी अर्थ में स्त्री का विशिष्ट अनुभव बनता है .... देखने वालों, ख़ासकर देखने वाले पुरुषों, जिनकी दृष्टि के स्पर्श की अवधारणा लड़कियों के स्त्री बनने की सामाजिक प्रक्रिया को समझने का एक महत्वपूर्ण औज़ार है.....”. एक और अंश: “लड़की अथवा औरत के संदर्भ में ‘नाज़ुक कलाई’ का ज़िक्र पूर्णतः एक सामाजिक कर्म के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि कलाई के जोड़ को सुरक्षित और मजबूत रखने की चुनौती किसी टकराव के समय पुरुष और स्त्री दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए.”
इस किताब को पढ़ने के लिए मेहनत की ज़रूरत भी है, लेकिन वह करना हिंदी पाठक के लिए गुणकारी ही होगा.

  • 'सूरदास', रीतिकाव्य- नंद किशोर नवल, राजकमल प्रकाशन
नंदकिशोर नवल हिंदी के परिचित आलोचक हैं. यह बताना ज़रूरी है इस स्तम्भ के पाठकों को कि वे मेरे श्वसुर हैं. इसलिए काफ़ी देर तक मैं उनकी किताबों के उल्लेख को लेकर द्वंद्व में पड़ा रहा. लेकिन इस आश्वस्ति के साथ और बाद कि हिंदी के पाठक जगत में वह पहले से जाने जाते हैं, मैं उनकी इस साल आई दो किताबों का ज़िक्र करना चाहता हूँ.
एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में अपने लेखकीय जीवन का पूर्वार्ध बिताने के बाद नवलजी को इस विशेषण के ग़ैर ज़रूरी होने का अहसास होने लगा, यह उत्तरार्ध के उनके लेखन में विचारधारात्मक के स्थान एक साहित्यिक दृष्टि के संधान के उद्यम से जाना जा सकता है. साहित्य सबसे पहले आनंद के लिए पढ़ा जाता है. पर यह आनंद क्या है और एक व्यक्ति पाठक का किसी किसी रचना का अनुभव सामाजिक महत्व कब ग्रहण करता है, यह आलोचना का प्रश्न है.
बहरहाल! पिछले कुछ वर्षों में नंदकिशोर नवल मध्यकालीन रचनाकारों की ओर मुड़ गए हैं. 2012 में ‘आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास’ के बाद इस साल उनकी ये दो किताबें आई हैं. नवलजी इन्हें आस्वादपरक आलोचना कहते हैं. इन कवियों पर किसी नए शोध की अपेक्षा के साथ इन किताबों को पढ़ने पर निराशा होगी. कवियों के संपूर्ण अध्ययन का दावा यहाँ नहीं है. किसी विश्लेषणात्मकता का भी नहीं. एक तरह से ये साहित्य से पके नेत्रों से की गई पाठकीय यात्रा के दो पड़ाव हैं. साहित्यिक पाठ के पुनरुद्धार में ये कितनी कामयाब हुई हैं, इन्हें पढ़ कर ही जाना जा सकता है.

  • हिंदी रंगमंच की लोक धारा- जावेद अख़्तर ख़ान, वाणी प्रकाशन
हिन्दी रंगमंच की आधुनिकता के क्या मायने हैं? क्या वह तभी आधुनिक हो पाता है जब वह साक्षरता और आधुनिक शिक्षा पर आधारित सामाजिक संस्कारों से लैस हो लेता है? क्या उसकी आधुनिकता का अर्थ एक लिखित संस्कृति की भाषा और मुहावरे में ही समझा जा सकता है? क्या वह पूर्ववर्ती मौखिक सांस्कृतिक रूपों से अपनी विच्छिन्नता की घोषणा के बग़ैर वह आधुनिक नहीं हो सकता?
और क्या अलिखित भाषिक या मौखिक लोक सांस्कृतिक रूपों में अभिव्यक्त रंग परम्परा किसी एक विशेष काल-बिंदु पर आकर लुप्त हो जाती है? उसे आधुनिक का पूर्ववर्ती कहना कितना उचित है? क्या पारम्परिक 'अशिक्षित' समाज की अभिव्यक्तियाँ मात्र इस अर्थ में उपयोगी हैं कि आधुनिकता अपनी शर्तों पर उनका प्रयोग कर सके? फिर भिखारी ठाकुर आधुनिक हैं या नहीं? या, हबीब तनवीर के रंगमंच को क्या आधुनिक विषय-वस्तु और पारंपरिक लोक-रूप का संगम मान लें? जावेद अख़्तर अपनी इस किताब में वास्तविक रंग प्रसंगों और अनुभवों की रौशनी में इन सवालों पर विचार करते हैं. भाषा का मज़ा आपको मिलेगा, बातचीत का ज़िन्दा अंदाज़.
मगहर’ पत्रिका का दलित बचपन पर केन्द्रित अंक- संपादक: मुकेश मानस
अंत में मैं पिछले साल के आरम्भ में पुस्तक मेले से ख़रीदी इस पत्रिका का ज़िक्र किताब की श्रेणी में करना चाहूँगा. भारत में मनोविज्ञान अब तक भारतीय बचपन का अपना सिद्धांत नहीं बना पाया है. हमारे पास बचपन को समझने की सारी सैद्धांतिक श्रेणियाँ पश्चिमी अनुभवों से ली गई हैं. भारतीय बचपन भी क्या एक है? सवर्ण और दलित बच्चों के मन क्या एक से हैं?
हिन्दू और मुस्लिम बच्चों के अनुभव कितने समान हैं और कितने अलग? दलित आत्मकथाएँ हमेशा वयस्क अनुभवों की तरह पढ़ी जाती हैं. तकरीबन पैंतीस स्त्री-पुरुष लेखकों ने अपने बचपन की कथाएं कही हैं जो अपनी वर्णनात्मकता के कारण पढ़ी जानी चाहिए. यह संग्रह मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों के साथ साहित्य के पाठकों के लिए ऐसी खान है, जिसमें उतरे बिना वे भारतीय मन के निर्द्वंद्व आख्यान का पाखण्ड पहचान नहीं पाएंगे.

बजरंग बिहारी तिवारी


बजरंग बिहारी तिवारी,हिन्दी आलोचक
बजरंग बिहारी तिवारीः 'भारतीय साहित्य:एक परिचय’(२००५) संपादन-अंजना नीरा देव तथा सनम खन्ना, यथास्थिति से टकराते हुए(द्विभाषिक): दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियां’ (२०१२) संपादन-अनिता भारती के साथ. ’यथास्थिति से टकराते हुए: दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कविताएं’ (२०१३) संपादन-अनिता भारती के साथ.
इस वर्ष हिन्दी आलोचना विधा में ऐसी कोई किताब मेरे देखने में नहीं आयी जिससे साहित्य परिदृश्य में किसी बुनियादी मान्यता पर पुनर्विचार की आवश्यकता शिद्दत से महसूस हो. लेकिन अलग-अलग कारणों से चार किताबों का उल्लेख करना चाहूंगा.

  • भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ- कर्मेंदु शिशिर, नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली.
नवजागरण संबंधी बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास और हिन्दी नवजागरण को तुलनात्मक सन्दर्भों में रखने की अच्छी कोशिश. हिन्दीवाद का आग्रह नहीं.

  • दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ- ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
हिन्दी दलित साहित्य के संस्थापकों में से एक ओमप्रकाश वाल्मीकि का महत्त्वपूर्ण आलोचना ग्रन्थ. दलित साहित्य की कई भीतरी दिक़्क़तों की जानकारी इससे मिलती है. आत्मालोचन की ज़रूरत का रेखांकन. साहित्य में पसरे जातिवाद का संज्ञान.

  • समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
दलित स्त्रीवाद की बनती वैचारिकी और जीवन-दृष्टि को समझने में सहायक किताब. पितृसत्ता के दलित संस्करण की साहसिक समीक्षा.

  • प्रेमचंद और दलित विवाद- (संपा)सुधीर प्रताप सिंह, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली.
हिन्दी के समाज विमर्श में प्रेमचंद की केन्द्रीयता और जातिवादी मानसिकता की गहराई को जांचा गया है. अस्मितावाद के संकरे दायरे को इस किताब के कई लेख बखूबी उजागर करते हैं.

संजीव कुमार


संजीव कुमार, हिन्दी आलोचक
संजीव कुमारः आलोचक, कहानीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में हिन्दी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर.
साल २०१३ में कथेतर गद्य की जो किताबें पढ़ पाया हूँ उनमें से उल्लेखनीय किताबें इस प्रकार हैं.

  • शब्द और देशकाल- कुंवर नारायण, राजकमल प्रकाशन
यह कुंवर नारायण के लेखों और व्याख्यानों का संकलन है. कुंवर जी साहित्य के अंतर्विषयक उपागमों से लेकर संगीत, सिनेमा और अन्य कलाओं तक पर जितने अनायास ढंग से कलम चलाते हैं, वह अद्भुत है.
इससे इनकार नहीं कि किताब में कुछ चीज़ें भर्ती की भी हैं, मसलन आधे-आधे पृष्ठ की 'निजी और सामाजिक' 'युद्ध और कविता' जैसी टिप्पणियाँ. पर साठ फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा सूचना और विचार की दृष्टि से समृद्ध है .

  • वे हमें बदल रहे हैं- (संपा)बलवंत कौर, सामयिक प्रकाशन
यह 'हंस' के पिछले कुछ समय के सम्पादकीयों (लेखक - राजेंद्र यादव) का संकलन है . मृत्यु से पूर्व राजेंद्र जी की आख़िरी किताब. इन सम्पादकीय टिप्पणियों में उनका तेवर पहले की तुलना में बदला हुआ है. तीखापन और आक्रामकता कम है, हताशा का स्वर हावी है. पर विश्लेषण की धार और चीज़ों को देखने का 'रैडिकल' तरीक़ा तो वैसा ही है.

  • निराशा में भी सामर्थ्य- पंकज चतुर्वेदी, आधार प्रकाशन
यह पंकज की आलोचनात्मक और सामयिक टिप्पणियों-लेखों का संग्रह है. पंकज स्थापित मान्यताओं से आतंकित होने वाले पाठक-आलोचक नहीं हैं और उनमें एक तरह की सबवर्सिव कार्रवाई करने का दुस्साहस है जो उन्हें पठनीय बनाता है. शोधपरक लेखों से लेकर सामयिक विषयों पर लिखी गयी टिप्पणियों तक, हर जगह आपको बारीकी के साथ कहने का अंदाज़ और आर्टिकुलेशन मिलेगा .

  • हिंदी में समाचार- अरविन्द दास, अंतिका प्रकाशन
उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी प्रिंट-मीडिया के साथ क्या हुआ, इसकी शोधपरक पड़ताल. अरविन्द ने बाक़ायदा प्राविधि का पालन करते हुए इस काम को अंजाम दिया है. बदलाव और निरंतरता, दोनों को रेखांकित करने वाली यह किताब पिछले साल छपी 'मंडी में मीडिया' (विनीत कुमार) के साथ रख कर पढ़ी जानी चाहिए.

  • केंद्र में कहानी- राकेश बिहारी, शिल्पायन प्रकाशन
पिछले लगभग बीस सालों की कहानी पर, जिसे राकेश 'भूमण्डलोत्तर पीढ़ी' कहते हैं, यह एक क़ायदे की किताब है. उनके 'कैनन' को लेकर कुछ कुछ शिकायतें इपंले (इन पंक्तियों के लेखक) की भी हैं, कहानी को सिर्फ लेखकीय अभिमत के रूप में पढ़ने सराहने की पद्धति से भी थोड़ा असंतोष है, पर राकेश का अध्ययन व्यापक और विश्लेषण तीक्ष्ण है. उनका लेखन हिंदी कहानी पर बहस करने के लिए उकसाता है, इसे किसी किताब की बड़ी उपलब्धि मानना चाहिए.

  • समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन
दलित नारीवाद की स्थापित दलित विमर्श और स्त्री विमर्श से बहुत वाजिब शिकायतें रही हैं. अनिता भारती के लेखन में ये शिकायतें धारदार रूप में आती रही हैं. यह उनके ऐसे ही लेखों का संकलन है. साहित्य को सामाजिक प्रश्नों के साथ जोड़ कर देखने वालों के लिए एक ज़रूरी किताब.