शुक्रवार, 3 जनवरी, 2014 को 11:47 IST तक के समाचार

कथेतर हिन्दी गद्य की बारहा
आलोचना होती रही है. एक तो औपनिवेशिक शासन से निकले तीसरी दुनिया के एक ऐसे
देश की भाषा जिसको लेकर भांति-भांति के रगड़-झगड़ हैं, दूजे कहानी-कविता
की तुलना में वैचारिक गद्य पढ़ने वालों की क्षीण संख्या, कथेतर हिन्दी गद्य
की दुबली काया इन दोनों चिंताओं से कब उबर पाएगी, पता नहीं.
हिन्दी में उल्लेखनीय कथेतर गद्य आता भी कम है,
उसे स्वीकारा और सहेजा भी कम जाता है. बहरहाल, प्रस्तुत है साल 2013 में
प्रकाशित हिन्दी की किताबों की तीसरी किस्त, आलोचकों की पसंद.अपूर्वानंद

अपूर्वानंदः दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर. आलोचना कृति 'सुंदर का स्वप्न' और 'साहित्य का एकांत' प्रकाशित.
कथेतर कहने के बाद एक पाबंदी और है कि इस चयन में कविता को शामिल नहीं किया जाएगा. फिर भी इसका दायरा बहुत बड़ा ही रहता है. इसके भीतर आलोचना, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, शिक्षा, समाज अध्ययन, राजनीति, आदि जैसी अनेक विधाएँ शामिल हैं.
- चूड़ी बाजार में लड़की- कृष्ण कुमार, राजकमल प्रकाशन
“देह के अलग-अलग अंगों का ... अनुभव इसे इसी अर्थ में स्त्री का विशिष्ट अनुभव बनता है .... देखने वालों, ख़ासकर देखने वाले पुरुषों, जिनकी दृष्टि के स्पर्श की अवधारणा लड़कियों के स्त्री बनने की सामाजिक प्रक्रिया को समझने का एक महत्वपूर्ण औज़ार है.....”. एक और अंश: “लड़की अथवा औरत के संदर्भ में ‘नाज़ुक कलाई’ का ज़िक्र पूर्णतः एक सामाजिक कर्म के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि कलाई के जोड़ को सुरक्षित और मजबूत रखने की चुनौती किसी टकराव के समय पुरुष और स्त्री दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए.”
इस किताब को पढ़ने के लिए मेहनत की ज़रूरत भी है, लेकिन वह करना हिंदी पाठक के लिए गुणकारी ही होगा.
- 'सूरदास', रीतिकाव्य- नंद किशोर नवल, राजकमल प्रकाशन
एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में अपने लेखकीय जीवन का पूर्वार्ध बिताने के बाद नवलजी को इस विशेषण के ग़ैर ज़रूरी होने का अहसास होने लगा, यह उत्तरार्ध के उनके लेखन में विचारधारात्मक के स्थान एक साहित्यिक दृष्टि के संधान के उद्यम से जाना जा सकता है. साहित्य सबसे पहले आनंद के लिए पढ़ा जाता है. पर यह आनंद क्या है और एक व्यक्ति पाठक का किसी किसी रचना का अनुभव सामाजिक महत्व कब ग्रहण करता है, यह आलोचना का प्रश्न है.
बहरहाल! पिछले कुछ वर्षों में नंदकिशोर नवल मध्यकालीन रचनाकारों की ओर मुड़ गए हैं. 2012 में ‘आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास’ के बाद इस साल उनकी ये दो किताबें आई हैं. नवलजी इन्हें आस्वादपरक आलोचना कहते हैं. इन कवियों पर किसी नए शोध की अपेक्षा के साथ इन किताबों को पढ़ने पर निराशा होगी. कवियों के संपूर्ण अध्ययन का दावा यहाँ नहीं है. किसी विश्लेषणात्मकता का भी नहीं. एक तरह से ये साहित्य से पके नेत्रों से की गई पाठकीय यात्रा के दो पड़ाव हैं. साहित्यिक पाठ के पुनरुद्धार में ये कितनी कामयाब हुई हैं, इन्हें पढ़ कर ही जाना जा सकता है.
- हिंदी रंगमंच की लोक धारा- जावेद अख़्तर ख़ान, वाणी प्रकाशन
और क्या अलिखित भाषिक या मौखिक लोक सांस्कृतिक रूपों में अभिव्यक्त रंग परम्परा किसी एक विशेष काल-बिंदु पर आकर लुप्त हो जाती है? उसे आधुनिक का पूर्ववर्ती कहना कितना उचित है? क्या पारम्परिक 'अशिक्षित' समाज की अभिव्यक्तियाँ मात्र इस अर्थ में उपयोगी हैं कि आधुनिकता अपनी शर्तों पर उनका प्रयोग कर सके? फिर भिखारी ठाकुर आधुनिक हैं या नहीं? या, हबीब तनवीर के रंगमंच को क्या आधुनिक विषय-वस्तु और पारंपरिक लोक-रूप का संगम मान लें? जावेद अख़्तर अपनी इस किताब में वास्तविक रंग प्रसंगों और अनुभवों की रौशनी में इन सवालों पर विचार करते हैं. भाषा का मज़ा आपको मिलेगा, बातचीत का ज़िन्दा अंदाज़.
‘मगहर’ पत्रिका का दलित बचपन पर केन्द्रित अंक- संपादक: मुकेश मानस
अंत में मैं पिछले साल के आरम्भ में पुस्तक मेले से ख़रीदी इस पत्रिका का ज़िक्र किताब की श्रेणी में करना चाहूँगा. भारत में मनोविज्ञान अब तक भारतीय बचपन का अपना सिद्धांत नहीं बना पाया है. हमारे पास बचपन को समझने की सारी सैद्धांतिक श्रेणियाँ पश्चिमी अनुभवों से ली गई हैं. भारतीय बचपन भी क्या एक है? सवर्ण और दलित बच्चों के मन क्या एक से हैं?
हिन्दू और मुस्लिम बच्चों के अनुभव कितने समान हैं और कितने अलग? दलित आत्मकथाएँ हमेशा वयस्क अनुभवों की तरह पढ़ी जाती हैं. तकरीबन पैंतीस स्त्री-पुरुष लेखकों ने अपने बचपन की कथाएं कही हैं जो अपनी वर्णनात्मकता के कारण पढ़ी जानी चाहिए. यह संग्रह मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों के साथ साहित्य के पाठकों के लिए ऐसी खान है, जिसमें उतरे बिना वे भारतीय मन के निर्द्वंद्व आख्यान का पाखण्ड पहचान नहीं पाएंगे.
बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग
बिहारी तिवारीः 'भारतीय साहित्य:एक परिचय’(२००५) संपादन-अंजना नीरा देव
तथा सनम खन्ना, यथास्थिति से टकराते हुए(द्विभाषिक): दलित स्त्री जीवन से
जुड़ी कहानियां’ (२०१२) संपादन-अनिता भारती के साथ.
’यथास्थिति से टकराते हुए: दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कविताएं’ (२०१३)
संपादन-अनिता भारती के साथ.
- भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ- कर्मेंदु शिशिर, नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली.
- दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ- ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
- समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
- प्रेमचंद और दलित विवाद- (संपा)सुधीर प्रताप सिंह, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली.
संजीव कुमार

संजीव कुमारः आलोचक, कहानीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में हिन्दी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर.
- शब्द और देशकाल- कुंवर नारायण, राजकमल प्रकाशन
इससे इनकार नहीं कि किताब में कुछ चीज़ें भर्ती की भी हैं, मसलन आधे-आधे पृष्ठ की 'निजी और सामाजिक' 'युद्ध और कविता' जैसी टिप्पणियाँ. पर साठ फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा सूचना और विचार की दृष्टि से समृद्ध है .
- वे हमें बदल रहे हैं- (संपा)बलवंत कौर, सामयिक प्रकाशन
- निराशा में भी सामर्थ्य- पंकज चतुर्वेदी, आधार प्रकाशन
- हिंदी में समाचार- अरविन्द दास, अंतिका प्रकाशन
- केंद्र में कहानी- राकेश बिहारी, शिल्पायन प्रकाशन
- समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध- अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन
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