Monday, 11 November 2013
Saturday, 2 November 2013
बाजार की पत्रकारिता
समीक्षा, प्रभात खबर: पंकज चौधरी देश में जब से ग्लोबलाइजेशन का दौर शुरू हुआ है तब से अन्य
क्षेत्रों की तरह हिंदी पत्रकारिता में भी काफी बदलाव आए हैं. ये बदलाव खबरों के
चयन में भी देखने को मिल रहे हैं. आज वही खबरें सुर्खियां बनती हैं या अखबार के
पहले पेज पर जगह पाती हैं जो बाजारोन्मुख होती हैं. राजनीति और किसान-मजदूर की
खबरों की जगह पर आज यदि आर्थिकी, सिनेमा और खेल-कूद की खबरें सुर्खियां बनती हैं
तो उसके पीछे बाजार की शक्ति का हाथ है. जाहिर-सी बात है कि दलित विषय-वस्तु से
भी संबंधित उन्हीं खबरों या विचार को मुख्यधारा की मीडिया तवज्जो देता है जिनके
बाजार मूल्य तय होते हैं. अरविंद दास की किताब ‘हिन्दी में समाचार’ इन्हीं
मसाइलों की प्रमुखता से पड़ताल करती है.
यदि हम मुख्यधारा के मीडिया पर गौर करें, तो पाते हैं कि
25 प्रतिशत से भी अधिक की दलित आदिवासी आबादी वाले इस मुल्क में मुश्किल से उनकी
पांच खबरें भी पूरे साल में सुर्खियां नहीं बन पाती हैं. मसला वही कि बाजार के
दृष्टिकोण से इन खबरों का खास महत्व नहीं होता. लेकिन वहीं पर यदि कोई दलित
बुद्धिजीवी-चिंतक दलितों के सशक्तिकरण के लिए बाजार और पूंजी की जरूरत पर बल देते
हुए देखे या सुने जाते हैं तो उसे कॉरपोरेट घरानों के अखबार हाथों हाथ लेते हैं.
यहां यह भी पता चलता है कि मुख्यधारा का मीडिया कुछ खास दलित चिंतक को ही अपना
ब्रांड क्यों बनाता है.
यह किताब उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज में आए
बदलावों के बरक्स पूरे मीडिया की बनावट, उसके चरित्र में आए परिवर्तनों की पड़ताल
करती है. यह इस तथ्य को रेखांकित करती है कि हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ
राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं मिश्रित
अर्थव्यवस्था में दबी मध्यवर्गीय इच्छा खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल
कर अभिव्यक्त हो रही है.
मीडिया का पूरा ध्यान आज विज्ञापन उगाहने पर केंद्रित हो
गया है. अरविंद विश्लेषण करते दिखते हैं कि पिछले 25 वर्षों के दरमियान हिंदी
पत्रकारिता इस कदर बाजारोन्मुख हो गई है. वह पत्रकारिता के बदले स्वरूप का
समग्रता से लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं. यह किताब जनसंचार की भाषा शैली, मालिक और संपादक संबंध, पेड
न्यूज जैसे महत्वपूर्ण समकालीन मुद्दों पर भी रोशनी डालती है.
(प्रभात खबर, पटना के रविवार अंक में 27 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित)
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Sunday, 15 September 2013
समाज का नया चेहरा, नए तेवर और पत्रकारिता
समीक्षा: अमर उजाला, कल्लोल चक्रवर्ती भूमंडलीकरण ने हिंदी अखबारों को कितना बदला है? युवा
पत्रकार अरविंद दास बहुत मेहनत से तैयार अपने शोध पत्र में सिलसिलेवार ढंग
से बताते हैं कि पहले पन्ने पर राजनीतिक खबरों का वर्चस्व कम हुआ है। पहले
सभी अखबारों में सुर्खियां एक-सी रहती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
पहले स्थानीय खबरों को छापना गंभीर पत्रकारिता के खिलाफ
माना जाता था। अब अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुकाबले स्थानीय खबरों को ज्यादा
तरजीह दी जाने लगी है। खबरों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है।
लेकिन भाषा पहले की तुलना में बेहतर भी हुई है। अब छोटे-छोटे वाक्य लिखे
जाते हैं और खबरों की भाषा अनौपचारिक है। औरतों पर होने वाले अत्याचार की
भाषा में चिंता या आक्रोश के बजाय एक किस्म की रसलीनता दिखती है। धार्मिक
समारोह, पर्व-त्योहार आदि के प्रति अखबारों में जगह बढ़ी है। आर्थिक खबरों
का महत्व बहुत अधिक बढ़ा है। हिंदी क्षेत्र में शिक्षा और समृद्धि बढ़ी है,
लेकिन साहित्य के पाठक कम हुए हैं।
इसी तरह हाशिये के लोगों की मौजूदगी भी कम से कम है। पहले जो विज्ञापन अखबारों के बीच के पृष्ठों पर होते थे, वे अब पहले पेज पर आ गए हैं। भूमंडलीकरण के साथ आई संचार क्रांति के औजारों का इस्तेमाल अखबार की साज-सज्जा पर बढ़ा है। अब फोटो, ग्राफिक्स और एनिमेशन आदि के मुताबिक खबरों को सजाया जाता है। लेखक के शोध का आधार ′नवभारत टाइम्स′ है, जिस पर भूमंडलीकरण का असर सबसे पहले दिखा और सबसे अधिक भी। लेकिन तथ्य यह भी है कि हिंदी के जिन अखबारों ने प्रसार के मामले में अंग्रेजी अखबारों को बेदखल किया, उनमें ′नवभारत टाइम्स′ नहीं है। इसलिए उदारीकरण और हिंदी अखबारों का कोई भी अध्ययन उन क्षेत्रीय अखबारों के विश्लेषण के बगैर पूरा नहीं होगा, जिनके कई राज्यों में संस्करण हैं। इसके बावजूद उदारीकरण और हिंदी अखबारों पर यह एक अत्यंत जरूरी किताब तो है ही।
(अमर उजाला के रविवार अंक में 15 सितंबर 2013 को प्रकाशित)
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Wednesday, 4 September 2013
समीक्षा: हिंदी में समाचार
रंगनाथ सिंह: इस किताब की अब तक काफी तारीफ हो चुकी है. इपंले (इन पंक्तियों का लेखक) इस
किताब के लोकार्पण समारोह में शामिल था. लोकार्पण में मुख्य वक्ता थे प्रोफेसर वीर
भारत तलवार, पत्रकार ओम थानवी, पत्रकार करन थापर और पत्रकार रवीश कुमार. मंच
संचालन का जिम्मा भी एक भूतपूर्व पत्रकार अविनाश दास निभा रहे थे. जब एक प्रोफेसर,
वो भी जनेवि का, और पाँच पत्रकार, सभी अग्रणी संस्थानों के, जिस किताब की
भूरि-भूरि तारीफ कर चुके हों उस किताब पर कोई सार्वजनिक राय रखना थोड़ा मुश्किल
है. यह मुश्किल तब और भी बढ़ जाती है जब लिखने वाला (इंपले) खुद न तो अनुभवी पत्रकार
हो, न ही प्रोफेसर. अतः इंपले की इस कलमदराजी को एक पाठक की प्रतिक्रिया मात्र
माना जाए. इंपले को यह भी लगता है कि अन्य जगहों पर इस किताब की अच्छाइयों का
पर्याप्त जिक्र हो चुका होगा इसलिए इंपले का कर्तव्य बनता है कि इस समीक्षा में वह
किताब की अच्छाई के इतर भी दो बातें कह सके.
मुझे उम्मीद है कि यह किताब सिर्फ प्रोफेसरों और पत्रकारों के लिए नहीं लिखी
गई है. अपने शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप
में छपवाते समय अरविंद दास की नजर में सामान्य पाठक भी जरूर रहे होंगे. पूरी किताब
नहीं, न सही, कम से कम किताब का सरल एवं सुंदर शीर्षक तो इस बात की पुष्टि करता है
कि अरविंद को पाठकों का भी किंचित ख़्याल था. ये अलग बात है कि किताब ही तरह किताब
का शीर्षक भी थोड़ा भ्रामक है.
किताब के शीर्षक से प्रतीत होता है कि यह क़िताब हिन्दी मीडिया का विश्लेषण
करती है. यह पुस्तक ऐसा कत्तई नहीं करती है. ऐसा भी नहीं है कि यह किताब उन जाली
किताबों की कड़ी में आई नई किताब है जिसे प्रकाशकों की माँग पर फेसबुक स्टेटसों को
इकट्ठा करके लिखा गया है. यह पुस्तक एक शोध प्रबन्ध पर आधारित है. यह शोध किसी
ऐसी-वैसी जगह से नहीं किया गया है. यह शोध प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू
विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अंतर्गत किया गया है. लेखक अरविन्द दास की सारी
समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं. यह पुस्तक भी गंभीरता और अध्ययनशीलता के निकष पर
खरी उतरती है फिर भी किताब समस्याग्रस्त है और इसकी समस्या बहुत ही बुनियादी है.
इंपले की विनम्र राय है कि अरविंद दास इस शोध के प्रारूप को बनाने में ही चूक
गए. यह पुस्तक मूलतः हिन्दी मीडिया पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव के अध्ययन का एक
प्रयास है. अरविन्द दास पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं कि "...पीएचडी की थीसिस के लिए मैंने 'हिन्दी पत्रकारिता पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव' विषय
को चुना था. यह किताब मेरे शोध प्रबन्ध का किंचित संशोधित रूप है."
किताब की सबसे बड़ी सीमा यही है कि यह हिन्दी पत्रकारिता के अध्ययन के लिए
मात्र एक अखबार को आधार सामाग्री बनाया. वह अखबार है नवभारत टाइम्स उर्फ एनबीटी.
भूमण्डलीकरण के प्रभाव को रेखांकित करने के लिए एनबीटी के 1986 और 2005 के अखबार
का चयन किया है. वह भी चुने गए गए पृष्ठों के आधार पर. अरविंद ने लम्बे शोध अध्ययन
में जिन परिवर्तनों को रेखांकित किया है उनमें से ज्यादातर परिवर्तनों के बारे में
हिन्दी लोकवृत्त में अक्सर ही लिखा जाता है. अरविंद को उपलब्धि यह है कि उन्होंने
इसके लिए कुछ तथ्य भी प्रस्तुत किए हैं. पाठकों की सुविधा के लिए कुछेक निष्कर्षों
का जिक्र करना समीचीन होगा. अरविंद ने एनबीटी
के 1986 और 2005 के अखबारों के मुख्य पृष्ठ का अध्ययन करके बताया है कि 1986 में
अखबार के मुख्य पृष्ठ पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी खबरों का
बाहुल्य था. 2005 में एनबीटी के प्रथम पृष्ठ पर खेल और अर्थशास्त्र से जुड़ी खबरों
का दबदबा था. 1986 में अखबार में सुगम कितु साहित्यिक प्रभाव वाली हिन्दी का बरताव
होता था. 2005 में अखबार ने धड़ल्ले से हिंग्लिश का प्रयोग करना शुरू कर दिया. टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह से जुड़े होने का कारण एनबीटी
तकनीकी रूप से देश के दूसरे भाषाई अखबारों से आगे रहा है. लेखक के अनुसार
भूमण्डलीकरण का प्रभाव अखबार के पहले पन्नों पर विज्ञापनों के प्रकाशन मे भी देखा
जा सकता है.
महिलाओं से जुड़ी खबरों के मामले में एनबीटी 2005 में 1986 से बेहतर कवरेज
करता है लेकिन धर्म के मामले में एनबीटी ने 2005 में ज्यादा हल्का रुख अपनाया.
तीज-त्यौहारों के साथ ही धार्मिक अंधविश्वासों से जुड़ी खबरें भी 2005 में 1986 के
मुकाबले बहुत ज्यादा प्रमुखता पाने लगी थीं. अरविंद दास ने एनबीटी के एक वरिष्ठ
अधिकारों के हवाले से बताया है कि एनबीटी अपने रीडर्स को ध्यान में रखकर ही
सामाग्री का चयन करता है और उस अधिकारी के अनुसार एनबीटी के रीडर मुख्यतः
मध्यवर्गी हैं. इसलिए एनबीटी में किसानो और मजदूरों से जुड़ी खबरें सुर्खियों में
अपवाद स्वरुप ही आती हैं. लेखक कहते हैं कि ऐसी खबरें पहले भी कम आती थी लेकिन
2005 आते-आते इनकी संख्या नगण्य हो गई. किसानों
और मजदूरों की तरह ही दलितों और आदिवासियों से जुड़ी खबरें भी एनबीटी की
सुर्खिंयां अपवादस्वरूप ही बनती हैं. यही हाल साहित्य का भी है. 1986 में एनबीटी
में साहित्य संबंधी खबरों का समुचित हिस्सा था. 2005 आते-आते साहित्य एनबीटी में
हाशिए पर चला जाता है.
अरविंद ने 1986 और 2005 के सामग्री का जो भी विश्लेषण प्रस्तुत किया है उससे
असहमत होने का सवाल नहीं है क्योंगि वो ठोस आंकड़ों पर आधारित हैं.
लेकिन अरविंद पूरी किताब में पाठकों को कहीं भी यह नहीं समझा पाए हैं कि
वर्तमान में मात्र दो महानगरों तक सिमटे अखबार को हिन्दी समाचार पत्रों के प्रतिनिधि
के रूप में कैसे स्वीकार किया जा सकता है. जबके देश में अंग्रेजी के अखबारों से
ज्यादा बिकने वाले तीन प्रमुख अखबारों के सामाग्री विश्लेषण के बिना हिन्दी
पत्रकारिता के बारे में कोई बात करना कैसे संभव है.
अरविंद पाठकों को यह समझाने में भी असफल रहे हैं कि भूमण्डलीकरण का प्रभाव किस
तरीके से पड़ा. उनकी किताब से तो लगता है कि पूरी दुनिया में कोई हवा चली और उसके
प्रभाव में एनबीटी वाले के नैतिक प्रतिमान बदल गए. यहाँ ध्यान देने की जरूरत है कि
यदि टाइम्स समूह के हिन्दी अखबार में 1991 के बाद उल्लेखनीय बदलाव आए तो इसकी समूह
के अंग्रेजी अखबार में कमोवेस ऐसे ही बदलाव आए थे. इसलिए इन बदलावों के हिन्दी जगत
तक सीमित रहने वाली परिघटना मानना भी अनुचित होगा.
अपनी लेखनी को विराम देते हुए यह भी कहना चाहूँगा कि अरविंद इस किताब के
उद्धरणों के अतिशय प्रयोग से परहेज करके इसे ज्यादा पठनीय बना सकते थे.
(समकालीन तीसरी दुनिया, सितंबर 2013)
Sunday, 30 June 2013
हिंदी पत्रकारिता में संवेदनशीलता का अभाव
"पहले के समाचार पत्रों में खबरों का विभाजन नहीं था. पत्रकारिता साहित्य से हमेशा जुड़ी रही. इसमें लेखक की संवेदना और चेतना महत्वपूर्ण होती थी. " बीते 11 मई को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में जेएनयू के प्रो. वीर भारत तलवार ने ये बातें कहीं. अरविंद दास की पुस्तक 'हिंदी में समाचार' के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा, " इस पुस्तक में तमाम अंतर्विरोधो पर प्रकाश डाला गया है. इसमें एक ओर स्त्रियों के सशक्तिकरण के साथ-साथ उनके उत्पीड़न के अंतर्विरोध का विश्लेषण है."
लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए तलवार ने कहा कि खबरों के प्रकार पर भी आपत्ति जाहिर की है. मसलन पिछले दिनों बलात्कार की खबरें जिस भाषा में लिखी गई, पुस्तक में उस भाषा के मर्दवादी रवैए की ओर संकेत किया गया है. इसके साथ-साथ आज हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की कमी के मुद्दे को भी उठाया गया है.
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| करन थापर और वीर भारत तलवार |
अंतिका प्रकाशन से आई अरविंद दास की पुस्तक को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के बदलाव की कहानी बताने वाली पुस्तक कहा है, जिसके जरिए सामाजिक परिवर्तन का इतिहास पता चलता है. कार्यक्रम में आईटीवी के अध्यक्ष करन थापर, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी और एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार भी मौजूद थे. करन थापर ने मीडिया के मौजूदा स्वरूप पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा, "आज मीडिया में टीआरपी हावी है. एक ही कार्यक्रमों या खबरों को बार-बार दिखाया जाता है. ऐसा लगता है जैसे देश-दुनिया में इसके अलावा कोई चर्चा का विषय है ही नहीं." थापर ने भाषा की गुणवत्ता में गिरावट आने की भी बात कही. उन्होंने अरविंद की पुस्तक का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें समाचार पत्रों का जिस प्रकार विश्लेषण किया गया है, उसी तरह आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी विश्लेषण होना चाहिए. कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि अरविंद ने अपनी पुस्तक के जरिए हिंदी पत्रकारिता के कलेवर को मापने की कोशिश की है. भूमंडलीकरण की छाया कैसे संपादकों पर पड़ती है, यह पुस्तक इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन है. इसके साथ-साथ थानवी ने भाषा के हो रहे पतन और खबरों से विलुप्त हो रही संवेदना पर भी चिंता व्यक्त की. इस दौरान रवीश कुमार ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन मोहल्ल लाइव के अविनाश कर रहे थे.
(प्रथम प्रवक्ता, 16-30 जून 2013, समाचार-विचार पाक्षिक)
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Monday, 20 May 2013
Inked in khush khabri and caution
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|
(HINGREZI
IN VOGUE:Decades ago, the Hindi used in print was ‘clear’, ‘crisp’,
‘conversational’ and more Hindustani in nature.PHOTO: AP/ Saurabh Das.)
|
PRASHANT JHA (THE HINDU)
For Hindi journalism, the expansion in numbers has
coincided with a change in the nature of content, confirming an earlier thesis
of the creation of a ‘new public sphere’
In 2005-2006, the late Prabhash Joshi and Ajit
Bhattacharjea – doyens of Indian journalism – visited Tilonia in Rajasthan. An
advertisement for Reliance Mobile was splashed on the back page of Dainik
Bhaskar, declaring that one could speak to anyone, anywhere in the country, for
a rupee. The same ad slogan appeared on the front page of the same paper, in
the same edition, as the news lead.
The local editor of the paper came to meet Mr Joshi, and
told him, “The ad came to us on the condition that we would provide them
editorial support.” In English, this was called creating a ‘favourable
editorial context’. Mr Joshi was to remark that not only were advertisements
being published, there was an effort to control the space around it as well.
Last week, Audit Bureau of Circulation (ABC) released
figures of newspaper circulation for the final six months of 2012. It confirmed
a trend that is now well established. Hindi newspapers sold the highest number
of copies among dailies in all languages in India, clocking a circulation of 15
million copies in the July-December period.
In a seminal book published in 2007, ‘Headlines from the
Heartland’, the media critic, Sevanti Ninan has attributed this massive
expansion in the Hindi ‘public sphere’ to a mix of factors – rising literacy,
increase in purchasing power, the political churning with the Mandal and Mandir
agitations in the Hindi heartland, the advent of TV which created a hunger for
news, technology, push by market forces and localisation of news with
proliferation of district editions.
A recent book, Hindi Mein Samachar, News in Hindi, by
researcher Arvind Das, argues that while there has been a rapid expansion, this
does not correspond with a similar qualitative transformation for the better.
Das studied journalism at the Indian Institute of Mass
Communication (IIMC), and then enrolled in Jawaharlal Nehru University for his
PhD. For his doctoral work, Das decided to examine the evolution of Hindi
journalism by doing a rigorous content analysis of the Delhi edition of a
single newspaper, Navbharat Times, published by the Bennett Coleman. There have
been more changes in the Hindi press in the last 20 years compared to 185 years
before that, he argues.
Compared to 1986, Hindi papers in the last decade have
more pages, more frequent and regular supplements, more photos, colour,
graphics, design, and visuals. The ‘look and feel’ of papers had altered. In
terms of content, an average front page story in 1986 was eight columns and
politics dominated the coverage. Now, there were fewer and shorter stories;
political and international coverage had reduced. Instead, economic/business
news and sports coverage had increased by a significant proportion. ‘Khush
khabri’, good news, is give priority.
Issues related to Dalits, farmers, and workers neither
found space then; nor does it now. There is a tendency to promote Hindu
religious customs and idioms. There has however been an increase in the
coverage of ‘women’s issues, even though stereotypes about representation
remain and ‘sensitivity’ is missing.
Das also examined the use of the language, and found
that two decades ago, the Hindi used in print was ‘clear’, ‘crisp’,
‘conversational’, and more ‘Hindustani’ in nature – using words derived from
various other linguistic traditions, like Sanskrit and Farsi, without
compromising the integrity of the language. Words used in popular literature
were borrowed. In 2005, there was a far greater use of English words, including
full sentences – even when ‘unnecessary’. A new ‘Hingrezi’, mix of Hindi and
English, language was being devised with strong influences of the market and
Bombay cinema.
Despite not being a language purist, the author contends
this does not meet the needs of the Hindi-speaking belt, especially first-time
readers who do not have other language skills and access to other sources of
information. He told The Hindu , “Hindi does not have a vast idiom of
social science research. Knowledge production still mostly happens in English.
In that context, the media – now that it has resources – could play a role in
giving us that language.” Das adds there is similar no investment in improving
content. “Why does no Hindi paper have a foreign correspondent anywhere?”
Theorists have spoken of how inherent in the transition
from elite to a mass based public sphere is the degeneration of discourse. Das
appears to subscribe to this view. But few can doubt the positive implications
of the growth in Hindi journalism. In her work, Ninan convincingly argued that
the public sphere had become ‘truly public’ in the process. Newspapers have
democratised debate, widened information horizon, and raised public
expectations vis-a-vis the State.
But the role of the market, which has partly made this shift
possible, remains a source of anxiety. Prabash Joshi narrated to Das an
anecdote, in 2008, a year before his death. A news bureau was auctioned off in
Ratlam of Madhya Pradesh for Rs 5 lakh; the role of the ‘bureau chief’ and the
‘boys’ he hired was not to collect news, but revenue for their own pockets and
the newspaper management. The ability of Hindi papers to sustain their growth,
contribute in expanding public sphere – while remaining true to journalism –
will define their future.
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